कल्पना कीजिए कि शीत युद्ध (Cold War) के चरम दौर का मॉस्को शहर है। दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड में एक अमेरिकी राजनयिक एक सुनसान सड़क पर चल रहा है। उसके पीछे सोवियत संघ की खूंखार खुफिया एजेंसी, केजीबी (KGB) के जासूसों की एक पूरी फौज साये की तरह लगी हुई है। केजीबी का ‘सेवंथ डायरेक्टोरेट’ (Seventh Directorate) दुनिया का सबसे खतरनाक निगरानी तंत्र माना जाता था, जिसका एकमात्र काम विदेशी दूतावासों के अधिकारियों की चौबीसों घंटे निगरानी करना था। ऐसे दमघोंटू और खतरनाक माहौल में, जहाँ आप किसी स्थानीय नागरिक से हाथ भी मिला लें तो उसे तुरंत पूछताछ के लिए उठा लिया जाता था, एक जासूस अपने देश तक अति-गोपनीय जानकारी कैसे पहुँचाएगा?
यहीं जन्म होता है ‘ट्रेडक्राफ्ट’ (Tradecraft) की दुनिया के उन दो सबसे अचूक और रोमांचक पैंतरों का, जिन्हें जासूसी की भाषा में ‘डेड ड्रॉप’ (Dead Drop) और ‘ब्रश पास’ (Brush Pass) कहा जाता है। एक छात्र, रक्षा विशेषज्ञ या इतिहास के अध्येता के रूप में, इन तकनीकों को समझना केवल जासूसी के तरीकों को जानना नहीं है, बल्कि यह समझना है कि जब इंसान को सबसे ज्यादा दबाया जाता है, तो उसका दिमाग संवाद करने के लिए कितनी खामोश और अदृश्य राहें खोज लेता है। इन तकनीकों ने बिना एक भी शब्द बोले, दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्यों की जड़ें हिला दीं।
आज हम इस अखबार के पन्नों पर किसी बुलेट पॉइंट या लिस्ट का सहारा नहीं लेंगे। आज हम इतिहास की उन सर्द और अंधेरी गलियों में चलेंगे, जहाँ आम सी दिखने वाली चीजें—जैसे एक ईंट, पुल के नीचे की मिट्टी, या सड़क पर चलते हुए दो अजनबियों का टकराना—राष्ट्रीय सुरक्षा के सबसे बड़े हथियार बन गए थे। हम जासूसी के इस मनोवैज्ञानिक खेल का उसकी पूरी गहराई, उसकी शानदार सफलताओं और उसकी खौफनाक विफलताओं के साथ विश्लेषण करेंगे।
जासूसी की दुनिया में ‘होस्टाइल एनवायरनमेंट’ (Hostile Environment) या ‘प्रतिकूल वातावरण’ उस शहर को कहा जाता है जहाँ दुश्मन की खुफिया एजेंसी का पूरी तरह से दबदबा हो। मॉस्को, पूर्वी बर्लिन, बीजिंग या हवाना जैसे शहरों में सीआईए (CIA) या एमआई-6 (MI6) के अधिकारियों के लिए अपने ‘सोर्स’ (जासूस) से आमने-सामने मिलना मौत को दावत देने जैसा था। अगर एक अमेरिकी अधिकारी किसी सोवियत वैज्ञानिक से कैफे में मिलता, तो दोनों का पकड़ा जाना तय था। इसलिए, खुफिया एजेंसियों ने एक ऐसा तरीका निकाला जहाँ सूचना का आदान-प्रदान तो हो, लेकिन दोनों व्यक्तियों को एक समय पर एक ही जगह मौजूद न रहना पड़े। इसे असिंक्रोनस कम्युनिकेशन (Asynchronous Communication) कहा जाता है, और इसका सबसे बेहतरीन रूप था ‘डेड ड्रॉप’।
‘डेड ड्रॉप’ का मतलब है कोई ऐसी गुप्त और आम सी दिखने वाली जगह, जहाँ एक जासूस अपनी खुफिया जानकारी (जैसे माइक्रोफिल्म या दस्तावेज) छिपा देता है, और कुछ समय बाद उसका ‘हैंडलर’ (उसे नियंत्रित करने वाला अधिकारी) आकर उसे चुपचाप वहां से निकाल लेता है। यह एक ऐसा पोस्ट बॉक्स था जिसका कोई पता नहीं होता था। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। एक सही ‘डेड ड्रॉप’ साइट खोजना अपने आप में एक कला थी। जगह ऐसी होनी चाहिए थी जहाँ आम लोगों की नजर न पड़े, लेकिन जासूस वहां बिना किसी शक के आसानी से पहुंच सके। यह कोई पार्क का कोना हो सकता था, किसी पुरानी इमारत की ढीली ईंट के पीछे की जगह, या फिर पुल के नीचे का कोई हिस्सा।
लेकिन केवल जगह खोजना ही काफी नहीं था। जानकारी को ऐसे छिपाना था कि अगर कोई सफाई कर्मचारी या कुत्ता भी वहां पहुंच जाए, तो उसे कुछ न मिले। यहीं पर सीआईए के ‘ऑफिस ऑफ टेक्निकल सर्विस’ (OTS) का कमाल सामने आता था। वे ऐसे उपकरण बनाते थे जो बिल्कुल असली दिखते थे। उन्होंने रबर के ऐसे ‘फेक रॉक’ (नकली पत्थर) बनाए जिनके अंदर एक खोखली जगह होती थी। उन्होंने मरे हुए चूहों (Dead Rats) का भी इस्तेमाल किया! सीआईए के अधिकारी मरे हुए चूहे के पेट में खुफिया दस्तावेज डालकर उसे सड़क के किनारे फेंक देते थे। केजीबी तो क्या, कोई आम नागरिक भी एक सड़े हुए चूहे को हाथ लगाने की नहीं सोच सकता था। बाद में, एक दूसरा अधिकारी आकर उस चूहे को चुपचाप उठा लेता था।
डेड ड्रॉप का यह तरीका अपने आप में जासूसी की दुनिया का एक मास्टरपीस था। इसका सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू यह था कि इसने जासूसों की जान बचाई। दोनों पक्षों को कभी एक साथ नहीं देखा जा सकता था, इसलिए केजीबी के लिए यह साबित करना लगभग असंभव हो जाता था कि कौन किसे जानकारी दे रहा है।
इस तकनीक की सबसे बड़ी सफलता का उदाहरण 1970 और 80 के दशक में ‘अडोल्फ टोल्काचेव’ (Adolf Tolkachev) के मामले में देखने को मिलता है। टोल्काचेव एक सोवियत इंजीनियर था, जिसकी पहुंच सोवियत संघ के सबसे उन्नत रडार और मिसाइल सिस्टम के डिजाइनों तक थी। वह अमेरिका के लिए काम करना चाहता था। सीआईए जानती थी कि टोल्काचेव से सीधे मिलना बहुत खतरनाक है। इसलिए उन्होंने मॉस्को में दर्जनों डेड ड्रॉप स्थापित किए। टोल्काचेव अपने ऑफिस से टॉप-सीक्रेट ब्लूप्रिंट चुराता, घर जाकर एक बेहद छोटे कैमरे से उनकी तस्वीरें लेता, और फिर उन फिल्मों को काम पर जाते समय किसी गंदे दस्ताने (Dirty Glove) या लकड़ी के टुकड़े में छिपाकर सड़क के किनारे छोड़ देता।
लेकिन यह प्रक्रिया केवल सामान छोड़ने तक सीमित नहीं थी। इसमें ‘सिग्नलिंग’ (Signaling) का एक बहुत ही मनोवैज्ञानिक और तनावपूर्ण खेल शामिल होता था। टोल्काचेव ने जब डेड ड्रॉप में सामान डाल दिया, तो सीआईए को कैसे पता चलेगा कि सामान वहां है? इसके लिए सिग्नल साइट्स का इस्तेमाल होता था। टोल्काचेव किसी तय किए गए टेलीफोन पोल या कूड़ेदान पर चाक (Chalk) से एक छोटा सा निशान बना देता था। सीआईए का अधिकारी अपनी कार से गुजरते हुए उस चाक के निशान को देखता, और समझ जाता कि ‘डेड ड्रॉप’ भर दिया गया है। जब सीआईए उस सामान को निकाल लेती, तो वे किसी दूसरी जगह पर एक और निशान बना देते, जिसका मतलब होता था, “हमने सामान ले लिया है, तुम सुरक्षित हो।” टोल्काचेव ने इस अदृश्य संचार के माध्यम से अमेरिका को अरबों डॉलर की खुफिया जानकारी दी, जिसने शीत युद्ध के दौरान अमेरिकी वायुसेना को तकनीकी रूप से सोवियत संघ से कई दशक आगे कर दिया। इसीलिए टोल्काचेव को इतिहास में ‘द बिलियन डॉलर स्पाई’ (The Billion Dollar Spy) कहा जाता है।
हालांकि, इस सिक्के का दूसरा और स्याह पहलू भी था। डेड ड्रॉप एक अत्यंत असुरक्षित और मनोवैज्ञानिक रूप से थका देने वाली प्रक्रिया थी। यह इस व्यवस्था का सबसे बड़ा नकारात्मक पहलू है। जब आप अपनी जान जोखिम में डालकर कोई खुफिया जानकारी किसी पत्थर के नीचे छोड़ते हैं, तो आपके मन में अनगिनत खौफनाक सवाल उठते हैं। क्या केजीबी ने मुझे देख लिया है? क्या उन्होंने वह जगह खोज ली है? क्या वे उस पत्थर के पास बैठकर मेरे हैंडलर के आने का इंतजार कर रहे हैं? यह मानसिक तनाव कई जासूसों को पागलपन की हद तक ले जाता था।
डेड ड्रॉप की इसी कमजोरी ने अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी खुफिया विफलताओं में से एक को जन्म दिया। यह कहानी है एफबीआई (FBI) के एक वरिष्ठ अधिकारी ‘रॉबर्ट हैनसेन’ (Robert Hanssen) की। हैनसेन ने लगभग 20 साल तक सोवियत संघ और बाद में रूस के लिए काम किया, और अमेरिका के सबसे गहरे राज बेचे। हैनसेन इतना चालाक था कि वह कभी किसी रूसी अधिकारी से आमने-सामने नहीं मिला। उसने केवल डेड ड्रॉप्स का इस्तेमाल किया। वह वर्जीनिया के फॉक्सस्टोन पार्क में एक लकड़ी के पुल के नीचे कूड़े के बैग में अमेरिका के टॉप-सीक्रेट दस्तावेज छोड़ देता था, और रूसी जासूस वहां बदले में हीरों और कैश से भरा बैग रख जाते थे।
हैनसेन का मानना था कि उसका यह तरीका कभी नहीं पकड़ा जाएगा। वह तकनीक और अपनी बुद्धिमत्ता के अहंकार में चूर था। लेकिन एक डेड ड्रॉप की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह ‘स्टेटिक’ (स्थिर) होता है। अगर दुश्मन को एक बार आपकी जगह का पता चल जाए, तो वह आपके लिए कब्र बन जाती है। सीआईए और एफबीआई ने रूस के ही एक जासूस को पैसे देकर केजीबी की वह फाइल खरीद ली, जिसमें हैनसेन की डेड ड्रॉप साइट्स का जिक्र था। 18 फरवरी 2001 को, जब हैनसेन उसी फॉक्सस्टोन पार्क के पुल के नीचे अपना टेप लपेटा हुआ बैग रखने गया, तो एफबीआई की दर्जनों बंदूकें उस पर तन गईं। उसका डेड ड्रॉप ही उसकी गिरफ्तारी का कारण बन गया। यह घटना छात्रों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि आप संचार के तरीके कितने भी उन्नत क्यों न कर लें, मानवीय भूल और विश्वासघात हर व्यवस्था की जड़ें काट सकता है।
अब हम इस कहानी के दूसरे सबसे रोमांचक पहलू की ओर मुड़ते हैं—’ब्रश पास’ (Brush Pass)। जहां डेड ड्रॉप एक धीमी और रुकी हुई प्रक्रिया थी, वहीं ब्रश पास एक तेज, बिजली की गति से होने वाला ‘लाइव एक्शन’ था। कभी-कभी जानकारी इतनी महत्वपूर्ण और तात्कालिक होती थी कि उसे किसी पत्थर के नीचे छोड़कर हफ्तों इंतजार नहीं किया जा सकता था। ऐसे समय में जासूसों को आमने-सामने आना ही पड़ता था, लेकिन ऐसे कि किसी तीसरे व्यक्ति को कुछ पता ही न चले।
ब्रश पास का अर्थ है चलते-फिरते, बस एक क्षण के लिए दो लोगों का आमना-सामना होना और उसी एक सेकंड के हिस्से में किसी छोटी वस्तु या दस्तावेज की अदला-बदली कर लेना। इसे जासूसी की दुनिया का ‘बैले नृत्य’ (Ballet Dance) कहा जा सकता है, जिसके लिए महीनों की प्रैक्टिस और लोहे जैसे मजबूत स्नायु-तंत्र (Nerves of Steel) की आवश्यकता होती थी।
कल्पना कीजिए कि मॉस्को के एक भीड़भाड़ वाले मेट्रो स्टेशन पर सैकड़ों लोग सीढ़ियों से उतर और चढ़ रहे हैं। एक सोवियत सैन्य अधिकारी सीढ़ियों से नीचे उतर रहा है, उसके हाथ में एक मुड़ा हुआ स्थानीय अखबार है। सामने से सीआईए का एक अधिकारी ऊपर आ रहा है, उसके हाथ में भी बिल्कुल वैसा ही मुड़ा हुआ अखबार है। जब वे दोनों एक-दूसरे के पास से गुजरते हैं, तो उनकी चाल में कोई रुकावट नहीं आती, वे एक-दूसरे की तरफ देखते भी नहीं हैं, उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं होता। लेकिन उसी एक पल में, दोनों के हाथ टकराते हैं, अखबार बदल लिए जाते हैं, और वे अपनी-अपनी दिशा में आगे बढ़ जाते हैं। जो अखबार सोवियत अधिकारी ने सीआईए एजेंट को दिया है, उसके पन्नों के बीच सोवियत संघ की परमाणु मिसाइलों की माइक्रोफिल्म छिपी है। पीछे चल रहे केजीबी के निगरानीकर्ताओं को बस यही लगता है कि भीड़ में दो अजनबी टकरा गए थे।
ब्रश पास का सबसे ऐतिहासिक और सांसें रोक देने वाला उदाहरण ‘ओलेग पेनकोव्स्की’ (Oleg Penkovsky) का है। पेनकोव्स्की सोवियत सैन्य खुफिया एजेंसी (GRU) का एक कर्नल था, जिसने 1960 के दशक की शुरुआत में अमेरिका और ब्रिटेन को बेशकीमती जानकारी दी। पेनकोव्स्की ने 1962 के ‘क्यूबन मिसाइल क्राइसिस’ (Cuban Missile Crisis) के दौरान जो खुफिया दस्तावेज दिए थे, उसी के आधार पर अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी यह जान पाए थे कि क्यूबा में सोवियत मिसाइलें कितनी शक्तिशाली हैं और वे कब तक हमले के लिए तैयार हो जाएंगी। माना जाता है कि पेनकोव्स्की की दी गई जानकारी ने ही दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध और परमाणु प्रलय से बचाया था।
लेकिन पेनकोव्स्की यह जानकारी कैसे देता था? मॉस्को की सर्द सड़कों पर, वह अपनी पत्नी के साथ टहल रहा होता था। ब्रिटिश एमआई-6 का अधिकारी, ग्रेविल विन (Greville Wynne) या कोई सीआईए अधिकारी, एक अजनबी की तरह उनके पास से गुजरता था। जब वे एक-दूसरे के पास से गुजरते, पेनकोव्स्की अपनी जेब से सिगरेट का एक पैकेट निकालता और लापरवाही से उसे विन के हाथ में सरका देता। उस छोटे से सिगरेट के पैकेट के अंदर मिनी-कैमरे की रील होती थी, जिसमें दुनिया को तबाह कर सकने वाले हथियारों के राज बंद होते थे। यह प्रक्रिया इतनी खतरनाक थी कि अगर ब्रश पास के दौरान सामान गिर जाता, या कोई एक व्यक्ति घबरा जाता, तो खेल वहीं खत्म हो जाता।
ब्रश पास का निष्पक्ष विश्लेषण करें तो यह मानवीय मनोविज्ञान और भौतिक सतर्कता (Physical Situational Awareness) का सर्वोच्च उदाहरण है। यह तकनीक किसी महंगी मशीन या कंप्यूटर पर निर्भर नहीं थी; यह पूरी तरह से इंसानी समय-प्रबंधन (Timing) और भरोसे पर टिकी थी। एक हल्की सी घबराहट, आँखों का एक गलत इशारा, या चाल में आया एक अस्वाभाविक बदलाव केजीबी के प्रशिक्षित जासूसों की नजर में आ सकता था। अंततः, ओलेग पेनकोव्स्की का भी पर्दाफाश हो गया था, जिसके बाद उसे सोवियत संघ द्वारा मौत के घाट उतार दिया गया। यह दर्शाता है कि जासूसी के इस खेल में जीतने वाले को कोई मेडल नहीं मिलता, लेकिन हारने वाले को अपनी जान चुकानी पड़ती है।
समय के साथ, जब दुनिया ने 20वीं सदी से 21वीं सदी में प्रवेश किया और इंटरनेट तथा डिजिटल तकनीक का युग आया, तो लोगों को लगा कि ‘डेड ड्रॉप’ और ‘ब्रश पास’ जैसी पुरानी तकनीकें अब म्यूजियम का हिस्सा बन जाएंगी। लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। खुफिया एजेंसियों ने अपनी इन क्लासिक तकनीकों को कभी नहीं छोड़ा, बल्कि उन्हें नए युग के हिसाब से ढाल लिया।
आज के डिजिटल युग में, जासूसों को जानकारी देने के लिए खोखले पत्थरों या मरे हुए चूहों की उतनी आवश्यकता नहीं है। अब ‘डिजिटल डेड ड्रॉप’ (Digital Dead Drop) का इस्तेमाल होता है। इसे ‘शॉर्ट-रेंज एजेंट कम्युनिकेशंस’ (SRAC) कहा जाता है। आज का एक जासूस मॉस्को या बीजिंग के किसी कैफे में बैठकर अपने खास मॉडिफाई किए गए मोबाइल फोन या ट्रांसमीटर से एक अदृश्य वाई-फाई (Wi-Fi) नेटवर्क बनाता है। सीआईए का हैंडलर अपनी कार से उस कैफे के बाहर से गुजरता है। उसे कार रोकने की जरूरत नहीं है, न ही कैफे के अंदर जाने की। एक मील की दूरी से ही कार में लगा उपकरण जासूस के फोन से वह सारा एन्क्रिप्टेड डेटा कुछ ही सेकंड में डाउनलोड कर लेता है, और कार आगे बढ़ जाती है। यह आधुनिक युग का ब्रश पास है—जहाँ इंसान नहीं, बल्कि रेडियो तरंगें (Radio Waves) एक-दूसरे से टकराती हैं और खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान कर लेती हैं।
इसके अलावा, आज के दौर में सार्वजनिक स्थानों जैसे लाइब्रेरी की किताबों के बीच, या कैफे के बाथरूम में टॉयलेट के फ्लश टैंक के पीछे छोटी सी ‘यूएसबी फ्लैश ड्राइव’ (USB Flash Drive) को छिपा दिया जाता है। यह वही पुराना 18वीं और 19वीं सदी का डेड ड्रॉप है, बस इसका आकार और रूप बदल गया है।
छात्रों को यह समझने की आवश्यकता है कि जासूसी का मूल सिद्धांत कभी नहीं बदलता। तकनीकें भले ही कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाएं, इंसान हमेशा ऐसी संचार प्रणाली की तलाश में रहता है जो दुश्मन की आँखों के ठीक सामने हो, लेकिन उसके दिमाग की पहुँच से बाहर हो। एक सफल खुफिया ऑपरेशन वह नहीं है जो किसी जेम्स बॉन्ड की फिल्म की तरह धमाकों और गोलियों की बारिश के बीच किया जाए। सबसे सफल खुफिया ऑपरेशन वह है जो इतनी खामोशी से हो जाए कि दुश्मन को सालों तक यह पता ही न चले कि उसके सबसे गहरे राज किसी ने चुरा लिए हैं।
‘डेड ड्रॉप’ और ‘ब्रश पास’ का इतिहास हमें सिखाता है कि युद्ध केवल हथियारों और सेनाओं से नहीं लड़े जाते। सबसे खतरनाक और निर्णायक युद्ध उन खामोश पार्कों, मेट्रो स्टेशनों और सुनसान सड़कों पर लड़े जाते हैं, जहाँ एक आम सा दिखने वाला व्यक्ति, एक अनजान राहगीर को अपनी सिगरेट की डिब्बी पकड़ाता है, और उसी क्षण दुनिया के नक्शे पर देशों की किस्मत तय हो जाती है। यह एक ऐसा अदृश्य और निर्मम सच है जो इतिहास के पन्नों में हमेशा दर्ज रहेगा, उन अनाम जासूसों की कहानी के रूप में, जिन्होंने दुनिया को बचाने (या तबाह करने) के लिए अपने शब्दों को नहीं, बल्कि अपनी खामोशी को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।