प्रोजेक्ट अज़ोरियन: जब सीआईए ने 16,000 फीट गहरे महासागर से सोवियत पनडुब्बी चुराने का सबसे दुस्साहसिक जाल बिछाया

by V iS iO iN 1 min read

अंतरिक्ष की अनंत ऊंचाइयों से लेकर महासागर की अथाह गहराइयों तक, शीत युद्ध (Cold War) का दौर इंसानी महत्वाकांक्षाओं और जासूसी के सबसे खौफनाक प्रयोगों का गवाह रहा है। छात्रों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकारों के लिए, खुफिया ऑपरेशन्स का मतलब अक्सर जेम्स बॉन्ड जैसी जासूसी, सीक्रेट कोड्स या अंडरकवर एजेंट्स होता है। लेकिन इतिहास में एक पल ऐसा भी आया था, जब अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) ने जासूसी के सारे पारंपरिक नियम ताक पर रख दिए और एक ऐसा ‘इंजीनियरिंग चमत्कार’ करने का फैसला किया, जिसे सुनकर आज भी वैज्ञानिक दांतों तले उंगली दबा लेते हैं।

यह कहानी है ‘प्रोजेक्ट अज़ोरियन’ (Project Azorian) की। यह 1970 के दशक का एक ऐसा टॉप-सीक्रेट मिशन था, जिसका उद्देश्य प्रशांत महासागर के तल पर 16,000 फीट (लगभग 3 मील) की गहराई में डूबी एक सोवियत परमाणु पनडुब्बी को चुपचाप ऊपर खींच लाना था। यह कोई सुई खोजने जैसा काम नहीं था; यह 1,750 टन वजन के लोहे के एक विशालकाय ताबूत को बिना किसी को भनक लगे समुद्र से बाहर निकालने का मिशन था। इस एक ऑपरेशन ने तकनीकी विकास की सीमाओं को तोड़ा, कूटनीतिक धोखे की नई मिसालें कायम कीं और जासूसी की दुनिया को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। आइए, बिना किसी पूर्व-ग्रह के इस ऐतिहासिक मिशन के हर पहलू की तह तक चलते हैं।

1968 का वह रहस्यमयी धमाका और अमेरिका की ‘अंडरवाटर आँखें’

इस पूरी कहानी की शुरुआत 24 फरवरी 1968 को हुई, जब सोवियत संघ की एक ‘गोल्फ-II’ (Golf-II) क्लास बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी, जिसका नाम ‘K-129’ था, रूस के कामचटका प्रायद्वीप से प्रशांत महासागर में गश्त के लिए निकली। इस पनडुब्बी में तीन परमाणु मिसाइलें, दो परमाणु टॉरपीडो और सोवियत नौसेना की सबसे उन्नत क्रिप्टोग्राफी (कोडिंग) मशीनें मौजूद थीं।

मार्च 1968 के मध्य में, K-129 ने अचानक सोवियत नौसेना मुख्यालय से संपर्क तोड़ दिया। सोवियत संघ में हड़कंप मच गया। उन्होंने पनडुब्बी को खोजने के लिए अपने दर्जनों युद्धपोत, विमान और पनडुब्बियां प्रशांत महासागर में उतार दीं। हफ्तों तक चला यह खोज अभियान पूरी तरह से विफल रहा। सोवियत नौसेना को यह तक नहीं पता था कि उनकी पनडुब्बी प्रशांत महासागर के किस हिस्से में डूबी है। अंततः हार मानकर सोवियत संघ ने खोज अभियान रोक दिया और अपने नाविकों को मृत मान लिया।

लेकिन सोवियत संघ जो नहीं जानता था, वह यह था कि अमेरिका प्रशांत महासागर में ‘अंधा’ नहीं था। अमेरिकी नौसेना के पास महासागर के तल में बिछाया गया एक अति-गोपनीय और उन्नत ‘हाइड्रोफोन’ नेटवर्क था, जिसे SOSUS (साउंड सर्विलांस सिस्टम) कहा जाता था। इसका काम सोवियत पनडुब्बियों की आवाज़ सुनना था। जब सोवियत संघ K-129 को खोज रहा था, तब अमेरिकी इंटेलिजेंस ने अपने SOSUS डेटा का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि कुछ हफ्ते पहले हवाई (Hawaii) द्वीप से लगभग 1,500 मील उत्तर-पश्चिम में समुद्र के नीचे एक बहुत बड़ा धमाका (Acoustic signature) रिकॉर्ड हुआ था।

अमेरिका ने तुरंत अपनी एक विशेष पनडुब्बी ‘यूएसएस हैलिबट’ (USS Halibut) को उस जगह भेजा। हैलिबट ने समुद्र में कैमरे लटकाकर खोज शुरू की और कुछ ही हफ्तों में उसने 16,000 फीट की गहराई में K-129 का मलबा खोज निकाला। पनडुब्बी पूरी तरह तबाह नहीं हुई थी; उसका एक बड़ा हिस्सा समुद्र के तल पर लगभग साबुत पड़ा था।

यह अमेरिका के लिए सदी का सबसे बड़ा खुफिया जैकपॉट था। अगर अमेरिका उस पनडुब्बी से सोवियत संघ की परमाणु मिसाइलें, उनके डिज़ाइन और सबसे महत्वपूर्ण—उनकी ‘क्रिप्टोग्राफिक कोड मशीनें’ निकाल लेता, तो वह शीत युद्ध में सोवियत संघ से कई दशक आगे निकल जाता। लेकिन 16,000 फीट की गहराई पर दबाव इतना भयानक होता है कि वह लोहे को भी पिचका सकता है। वहां से 1,750 टन का मलबा उठाना उस समय अपोलो मिशन के तहत चांद पर इंसान भेजने से भी ज्यादा मुश्किल माना जा रहा था।

‘हावर्ड ह्यूजेस’ का मुखौटा: सदी का सबसे बड़ा कूटनीतिक धोखा

राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और सीआईए के सामने दो सबसे बड़ी चुनौतियां थीं। पहली चुनौती तकनीकी थी: इतनी गहराई से इतनी भारी चीज़ को कैसे निकाला जाए? और दूसरी चुनौती कूटनीतिक थी: सोवियत संघ की नाक के नीचे से यह सब कैसे किया जाए कि उन्हें भनक तक न लगे? अगर सोवियत नौसेना को पता चल जाता कि अमेरिका उनकी डूबी हुई परमाणु पनडुब्बी चुराने की कोशिश कर रहा है, तो इसे सीधे तौर पर युद्ध की घोषणा माना जाता और तीसरे विश्व युद्ध का खतरा पैदा हो जाता।

यहीं पर सीआईए ने ‘कवर स्टोरी’ (बहानेबाजी) का एक ऐसा ताना-बाना बुना जो आज भी खुफिया एजेंसियों के लिए एक केस स्टडी है। सीआईए को समुद्र के बीचों-बीच एक विशालकाय जहाज खड़ा करना था। यह जहाज वहां महीनों तक रुककर क्रेन और पाइप नीचे डालता, जो किसी भी उपग्रह या गुजरते हुए जहाज को आसानी से दिख जाता। इस ऑपरेशन को छिपाने के लिए सीआईए ने उस समय के सबसे मशहूर और सनकी अमेरिकी अरबपति ‘हावर्ड ह्यूजेस’ (Howard Hughes) से हाथ मिलाया।

हावर्ड ह्यूजेस अपनी अजीबोगरीब हरकतों और दुनिया से कटकर रहने के लिए जाने जाते थे। सीआईए ने दुनिया के सामने यह झूठी खबर फैलाई कि हावर्ड ह्यूजेस की कंपनी समुद्र के तल से ‘मैंगनीज नोड्यूल्स’ (Manganese Nodules – बहुमूल्य धातुओं के पत्थर) निकालकर खनन (Deep-sea mining) का एक नया व्यापार शुरू कर रही है। यह कवर स्टोरी इतनी शानदार थी कि पूरे अमेरिकी मीडिया ने इसे सच मान लिया। व्यापारिक पत्रिकाओं में इस नए ‘डीप-सी माइनिंग’ उद्योग पर बड़े-बड़े लेख छपने लगे। किसी को शक नहीं हुआ कि इस तथाकथित खनन के पीछे अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए बैठी है।

इस ‘खनन’ को अंजाम देने के लिए सीआईए ने एक विशेष जहाज बनवाया, जिसका नाम था— ‘ह्यूजेस ग्लोमार एक्सप्लोरर’ (Hughes Glomar Explorer)। यह कोई साधारण जहाज नहीं था। इसके बीचों-बीच एक बहुत बड़ा ‘मून पूल’ (Moon Pool) था—यानी जहाज के पेट में खुलने वाले ऐसे दरवाजे, जिनसे होकर कोई भी चीज सीधे समुद्र के अंदर भेजी जा सकती थी, और बाहर से किसी को कुछ दिखाई नहीं देता था। इस जहाज के अंदर एक विशालकाय स्टील का पंजा (Claw) बनाया गया था, जिसे इंजीनियरों ने ‘क्लेमेंटाइन’ (Clementine) नाम दिया था। इस पंजे को 16,000 फीट लंबे स्टील के पाइपों के जरिए नीचे जाना था, पनडुब्बी को जकड़ना था और उसे खींचकर जहाज के पेट (मून पूल) के अंदर लाना था। इस पूरे प्रोजेक्ट पर लगभग 800 मिलियन डॉलर (जो आज के समय में लगभग 4 बिलियन डॉलर के बराबर है) का भारी-भरकम बजट खर्च किया गया।

मिशन 1974: महासागर की गहराइयों में वह खौफनाक लिफ्ट

वर्ष 1974 की गर्मियों में, जब ‘ह्यूजेस ग्लोमार एक्सप्लोरर’ प्रशांत महासागर में K-129 के मलबे के ठीक ऊपर पहुंचा, तो समुद्र का मौसम बेहद खराब था। लहरें उफान पर थीं। लेकिन जहाज में लगा ‘गिम्बल सिस्टम’ (Gimbal System) इतना उन्नत था कि भारी तूफान में भी क्रेन और पाइपों को बिल्कुल सीधा रख सकता था।

ऑपरेशन शुरू हुआ। स्टील के पाइपों को एक-एक करके जोड़ा जाने लगा और विशालकाय पंजा ‘क्लेमेंटाइन’ धीरे-धीरे 16,000 फीट नीचे अंधकार में उतरने लगा। इस प्रक्रिया में कई दिन लग गए। सबसे खौफनाक पल तब आया जब अमेरिका का यह जहाज अपना काम कर रहा था और तभी सोवियत नौसेना के दो जहाज वहां गश्त करते हुए आ पहुंचे। सोवियत जहाजों ने ‘ग्लोमार एक्सप्लोरर’ के बेहद करीब आकर चक्कर लगाए। सीआईए के अधिकारी जहाज के अंदर सांसें रोके बैठे थे। अगर सोवियत अधिकारियों ने जहाज के मून-पूल में झांक लिया होता या उन पर हमला कर दिया होता, तो इतिहास कुछ और ही होता। लेकिन सोवियत नौसेना को लगा कि यह सिर्फ एक पागल अमेरिकी अरबपति का खनन जहाज है, और वे वहां से चले गए।

नीचे, क्लेमेंटाइन पंजे ने पनडुब्बी के मलबे को सफलतापूर्वक जकड़ लिया था। अब शुरू हुई वापसी की प्रक्रिया। 16,000 फीट नीचे से उस विशाल वजन को इंच-दर-इंच ऊपर खींचा जाने लगा। सब कुछ योजना के अनुसार चल रहा था। पनडुब्बी समुद्र तल से 9,000 फीट ऊपर आ चुकी थी। लेकिन तभी वह हुआ जिसका डर इंजीनियरों को सबसे ज्यादा था।

पनडुब्बी का ढांचा (Hull) समुद्र के पानी, दबाव और समय के कारण बेहद कमजोर हो चुका था। ऊपर खींचते समय पनडुब्बी पर अत्यधिक तनाव पड़ा और क्लेमेंटाइन पंजे के कुछ हिस्से टूट गए। अचानक, एक भयानक झटके के साथ पनडुब्बी बीच से टूट गई। K-129 का लगभग दो-तिहाई हिस्सा, जिसमें परमाणु मिसाइलें और वह बहुमूल्य कोड मशीन रखी थी, पंजे से फिसलकर वापस 16,000 फीट की गहराई में समा गया। सीआईए के मॉनिटर्स पर उस टूटते हुए मलबे को वापस गिरते देखना किसी बुरे सपने से कम नहीं था।

पूरी तरह निराश होने के बावजूद, सीआईए ने लिफ्ट जारी रखी। पनडुब्बी का बचा हुआ एक-तिहाई हिस्सा (आगे का भाग) जहाज के मून-पूल के अंदर सुरक्षित खींच लिया गया। जब अमेरिकी इंजीनियरों और खुफिया अधिकारियों ने उस मलबे के अंदर कदम रखा, तो उन्हें वह नहीं मिला जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा उम्मीद थी, लेकिन यह पूरी तरह से खाली हाथ लौटने वाला मिशन भी नहीं था।

360-डिग्री समीक्षा: इंजीनियरिंग की जीत, कूटनीतिक जोखिम और ‘ग्लोमार रिस्पॉन्स’

अगर हम इसके सकारात्मक पहलुओं और उपलब्धियों पर गौर करें, तो सीआईए ने जो हिस्सा निकाला था, उसमें सोवियत संघ के दो परमाणु ‘टॉरपीडो’ (Nuclear Torpedoes), कुछ महत्वपूर्ण नौसैनिक मैनुअल और कुछ सैन्य उपकरण शामिल थे। इनसे अमेरिका को सोवियत संघ के हथियारों के निर्माण और उनकी तकनीक को समझने में काफी मदद मिली। इसके अलावा, इंजीनियरिंग के दृष्टिकोण से यह एक असाधारण जीत थी। दुनिया में किसी ने नहीं सोचा था कि 16,000 फीट की गहराई से इतना भारी मलबा उठाया जा सकता है। इस प्रोजेक्ट के दौरान विकसित की गई तकनीक (जैसे हेवी-लिफ्ट जहाज और डीप-सी पोजिशनिंग) ने बाद में अपतटीय तेल (Offshore Oil) और गैस उद्योग में क्रांति ला दी।

इस कहानी का एक मानवीय पहलू भी था, जो अक्सर खुफिया ऑपरेशन्स में नजरअंदाज कर दिया जाता है। मलबे के अंदर अमेरिकी टीम को 6 सोवियत नाविकों के शव भी मिले। सीआईए ने शीत युद्ध की तमाम कटुता को किनारे रखते हुए, उन 6 सोवियत सैनिकों को एक कंटेनर में रखकर पूरे सैन्य सम्मान के साथ (जिसमें सोवियत राष्ट्रगान बजाया गया) वापस समुद्र में दफना दिया। सीआईए ने इस पूरी प्रक्रिया का एक वीडियो भी बनाया, जिसे दशकों बाद, 1992 में सोवियत संघ के पतन के बाद रूसी सरकार को सौंपा गया था।

लेकिन जब हम इस मिशन के नकारात्मक पहलुओं या विफलताओं का विश्लेषण करते हैं, तो तस्वीर थोड़ी धुंधली नजर आती है। 800 मिलियन डॉलर (आज के 4 बिलियन डॉलर) का यह भारी-भरकम खर्च अमेरिकी टैक्सपेयर्स का पैसा था। सीआईए का मुख्य लक्ष्य परमाणु मिसाइलें और कोडिंग मशीनें हासिल करना था, जो अंततः समुद्र में ही गिर गईं। कई कूटनीतिक विशेषज्ञों ने इस बात पर गंभीर सवाल उठाए कि एक डूबी हुई पनडुब्बी को चुराना अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत ‘ग्रेव रॉबिंग’ (कब्र से चोरी) के समान था। निक्सन प्रशासन ने इस बात का भारी जोखिम उठाया था कि अगर यह चोरी पकड़ी जाती, तो सोवियत संघ इसका आक्रामक जवाब दे सकता था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जो थोड़ी बहुत खुफिया जानकारी मिली, वह उठाए गए कूटनीतिक और आर्थिक जोखिम के अनुपात में बहुत कम थी।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा और दीर्घकालिक परिणाम (जो पूरी तरह से तटस्थ है) सूचना के अधिकार और पत्रकारिता की दुनिया में सामने आया। 1975 में, अमेरिका के कुछ खोजी पत्रकारों (विशेषकर जैक एंडरसन) को इस मिशन की भनक लग गई। उन्होंने सीआईए के ‘डीप-सी माइनिंग’ के झूठ को पकड़ लिया और प्रोजेक्ट अज़ोरियन की कहानी दुनिया के सामने छापने की तैयारी कर ली। पत्रकारों ने ‘सूचना के अधिकार’ (Freedom of Information Act – FOIA) के तहत सीआईए से दस्तावेजों की मांग की।

अब सीआईए एक अजीब धर्मसंकट में थी। अगर वे यह मान लेते कि हाँ, उन्होंने पनडुब्बी चुराई है, तो सोवियत संघ भड़क जाता। अगर वे इससे इनकार करते, तो वे पत्रकारों के सामने झूठ बोलते पकड़े जाते। इस स्थिति से निपटने के लिए सीआईए के वकीलों ने एक ऐसा वाक्य तैयार किया, जो आज भी दुनिया भर की खुफिया एजेंसियों का सबसे पसंदीदा हथियार है। सीआईए ने अदालत में जवाब दिया:

“We can neither confirm nor deny the existence of the information requested.” (हम मांगी गई जानकारी के अस्तित्व की न तो पुष्टि कर सकते हैं और न ही इससे इनकार कर सकते हैं।)

इस एक जवाब ने खुफिया दुनिया का व्याकरण बदल दिया। इसे आज पत्रकारिता और कानूनी भाषा में ‘ग्लोमार रिस्पॉन्स’ (Glomar Response) कहा जाता है। यह नाम उसी जहाज ‘ह्यूजेस ग्लोमार एक्सप्लोरर’ के नाम पर पड़ा है। आज भी, जब भी कोई खुफिया एजेंसी किसी संवेदनशील मामले पर टिप्पणी करने से बचना चाहती है, तो वह इसी ‘ग्लोमार रिस्पॉन्स’ का इस्तेमाल करती है।

प्रोजेक्ट अज़ोरियन की कहानी केवल 1970 के दशक के एक जासूसी मिशन की कहानी नहीं है। यह हमें सिखाती है कि जब राष्ट्रों के बीच वर्चस्व की जंग चरम पर होती है, तो विज्ञान और इंजीनियरिंग की सीमाएं कैसे टूटती हैं। यह इस बात का भी प्रमाण है कि इतिहास के सबसे बड़े और साहसिक मिशन अक्सर किसी सफलता या विफलता में नहीं, बल्कि एक ऐसे ‘कवर स्टोरी’ और ‘शब्दावली’ में बदल जाते हैं, जो आने वाली कई पीढ़ियों के लिए अध्ययन का विषय बन जाते हैं। प्रशांत महासागर की गहराइयों में आज भी वह K-129 पनडुब्बी दफन है, जो शीत युद्ध की उस खामोश और खतरनाक जंग का सबसे बड़ा प्रतीक है, जिसे दुनिया ने कभी देखा ही नहीं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *