कल्पना कीजिए कि आप प्रशांत महासागर के ठीक ऊपर 50,000 फीट की ऊंचाई पर एक भारी-भरकम ‘सी-119 फ्लाइंग बॉक्सकार’ (C-119 Flying Boxcar) सैन्य मालवाहक विमान उड़ा रहे हैं। आपके सामने एक असंभव सा काम है: अंतरिक्ष से 10,000 मील प्रति घंटे की रफ्तार से गिर रही एक छोटी सी कैप्सूल को हवा में ही लपकना। अगर आप चूक गए, तो वह कैप्सूल समुद्र की गहराइयों में डूब जाएगी और उसके साथ ही नष्ट हो जाएंगे वो अति-गोपनीय राज़, जिन्हें हासिल करने के लिए अमेरिका ने अरबों डॉलर खर्च किए हैं।
यह किसी हॉलीवुड की साइंस-फिक्शन (Sci-Fi) फिल्म का दृश्य नहीं है। यह 1960 के दशक की वह खौफनाक और रोमांचक वास्तविकता है, जिसने शीत युद्ध (Cold War) का पूरा कूटनीतिक और सैन्य व्याकरण बदल कर रख दिया था। छात्रों, रक्षा विशेषज्ञों और अंतरिक्ष विज्ञान के अध्येताओं के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि आज हम जिस ‘गूगल अर्थ’ (Google Earth) या डिजिटल स्पाई सैटेलाइट्स को बहुत आम बात मानते हैं, उसकी नींव एक ऐसे ‘पागलपन भरे’ प्रोजेक्ट पर रखी गई थी, जिसमें अंतरिक्ष से सचमुच में भौतिक फिल्म के डिब्बे (Film Canisters) पैराशूट के जरिए धरती पर गिराए जाते थे।
इस अति-गोपनीय और दुस्साहसिक मिशन का नाम था—‘प्रोजेक्ट कोरोना’ (Project Corona)।
आज हम इस विशेष रिपोर्ट में इतिहास के उस पन्ने को पलटेंगे, जहां कूटनीति, इंजीनियरिंग और इंसानी जान की बाजी एक साथ लगाई गई थी। हम बिना किसी पूर्व-ग्रह के इस मिशन की चमत्कारिक सफलताओं, उसकी दर्दनाक विफलताओं और उसके वैश्विक प्रभावों का एक ‘नैरेटिव’ (कथात्मक) विश्लेषण करेंगे। आइए, जानते हैं कि कैसे अंतरिक्ष से गिरे ‘गंदे डायपर’ (जैसे हमने पिछले अंक में पढ़ा था) की तरह, एक छोटे से डिब्बे ने तीसरे विश्व युद्ध को रोक दिया।
एक अंधा महाबली और ‘मिसाइल गैप’ का मनोवैज्ञानिक खौफ
इस कहानी की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें मई 1960 में वापस जाना होगा। जैसा कि हमने अपनी पिछली रिपोर्ट्स में ‘U-2 जासूसी कांड’ के बारे में पढ़ा था, 1 मई 1960 को सोवियत संघ ने अमेरिका के सबसे उन्नत U-2 जासूसी विमान को अपनी S-75 मिसाइल से मार गिराया था। पायलट गैरी पॉवर्स को बंदी बना लिया गया था।
इस एक घटना ने अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर (Dwight D. Eisenhower) के सामने एक भयानक संकट खड़ा कर दिया। अमेरिका ने भविष्य में सोवियत हवाई क्षेत्र में किसी भी मानव-रहित या मानव-सहित विमान को भेजने से तौबा कर ली थी। लेकिन समस्या यह थी कि अमेरिका अब पूरी तरह से ‘अंधा’ हो चुका था।
उस दौर में अमेरिकी राजनीति में ‘मिसाइल गैप’ (Missile Gap) नाम का एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक खौफ फैला हुआ था। सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव पूरी दुनिया में यह डींगें हांक रहे थे कि सोवियत संघ ‘सॉसेज (Sausages) की तरह’ परमाणु मिसाइलें बना रहा है। अमेरिकी राजनेताओं (विशेषकर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जॉन एफ. कैनेडी) को लग रहा था कि सोवियत संघ के पास सैकड़ों इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBMs) हैं, जो किसी भी वक्त न्यूयॉर्क या वाशिंगटन को राख में बदल सकती हैं।
इस ‘अंधेपन’ को दूर करने के लिए सीआईए (CIA) और अमेरिकी वायुसेना ने एक ऐसा समाधान निकाला जो उस समय विज्ञान के नियमों को चुनौती देने जैसा था। अगर हम हवाई जहाजों से तस्वीरें नहीं ले सकते, तो हम कैमरों को वहां क्यों न भेजें जहां सोवियत मिसाइलें पहुंच ही नहीं सकतीं? यानी पृथ्वी की कक्षा (Orbit) में। यहीं से ‘प्रोजेक्ट कोरोना’ को आधिकारिक रूप से हरी झंडी मिली।
इंजीनियरिंग का दुःस्वप्न: अंतरिक्ष से तस्वीरें धरती पर कैसे लाएं?
आज के समय में हम अपने मोबाइल फोन से एक तस्वीर खींचते हैं और वह एक सेकंड में दुनिया के दूसरे कोने में डिजिटल रूप में पहुंच जाती है। लेकिन 1950 और 60 के दशक में डिजिटल फोटोग्राफी का कोई अस्तित्व नहीं था। तस्वीरें ‘भौतिक रील’ (Photographic Film) पर खींची जाती थीं, जिन्हें डार्करूम में रसायनों से धोकर विकसित (Develop) करना पड़ता था।
अब सीआईए के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था: हम एक सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजकर तस्वीरें तो खिंचवा लेंगे, लेकिन उन तस्वीरों की ‘रील’ (Film) को सुरक्षित धरती पर वापस कैसे लाएंगे?
इस असंभव काम को संभव बनाने के लिए सीआईए ने अमेरिका की कुछ सबसे बेहतरीन कंपनियों को एक साथ जोड़ा। ‘आइटेक’ (Itek) कॉर्पोरेशन ने एक ऐसा पैनोरमिक (Panoramic) कैमरा बनाया, जो अंतरिक्ष से लगातार घूमते हुए जमीन के विशाल हिस्सों की तस्वीरें ले सकता था। इन कैमरों में ‘ईस्टमन कोडक’ (Eastman Kodak) द्वारा बनाई गई विशेष 70 मिमी (70mm) की फिल्म इस्तेमाल की जाती थी।
यह फिल्म कोई साधारण रील नहीं थी। छात्रों को यह इंजीनियरिंग पहलू समझना चाहिए कि अंतरिक्ष का वातावरण एक वैक्यूम (Vacuum) होता है। सामान्य कैमरा फिल्म अंतरिक्ष के वैक्यूम में जाते ही सूख कर पापड़ की तरह टूट जाती है या आपस में चिपक जाती है। कोडक के वैज्ञानिकों ने ‘पॉलिएस्टर’ (Polyester) आधारित एक ऐसी विशेष फिल्म बनाई, जो अंतरिक्ष के भयानक तापमान और दबाव को सह सके। एक कोरोना सैटेलाइट में लगभग 32,000 फीट (लगभग 6 मील) लंबी फिल्म लोड की जाती थी।
लेकिन असली इंजीनियरिंग दुःस्वप्न तो अभी बाकी था। जब कैमरे में तस्वीरें कैद हो जाती थीं, तो उस फिल्म को एक विशेष कैप्सूल (Satellite Recovery Vehicle – SRV) में लपेटा जाता था। अब इस कैप्सूल को वापस वायुमंडल में प्रवेश (Re-entry) करना था। जब कोई भी वस्तु 10,000 मील प्रति घंटे की रफ्तार से वायुमंडल में घुसती है, तो घर्षण (Friction) के कारण उसका तापमान हजारों डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। अगर यह कैप्सूल जल गया, तो सारी मेहनत राख हो जाएगी।
जनरल इलेक्ट्रिक (General Electric) के इंजीनियरों ने एक ‘एब्लेटिव हीट शील्ड’ (Ablative Heat Shield) का निर्माण किया। यह एक ऐसा कवच था जो वायुमंडल में घुसते समय खुद जलकर और पिघलकर कैप्सूल के अंदर रखी बहुमूल्य फिल्म को ठंडा और सुरक्षित रखता था।
‘मिड-एयर कैच’: मौत के मुंह से डेटा छीनने का बैले नृत्य
अब हम उस चरण पर आते हैं जो इस पूरे प्रोजेक्ट का सबसे खतरनाक, साहसिक और खौफनाक हिस्सा था। जब कैप्सूल वायुमंडल में सुरक्षित प्रवेश कर लेता था और पृथ्वी से लगभग 50,000 फीट की ऊंचाई पर होता था, तो उसमें से एक छोटा सा पैराशूट खुलता था।
सीआईए यह नहीं चाहती थी कि यह कैप्सूल समुद्र के खारे पानी में गिरे। खारा पानी फिल्म को नष्ट कर सकता था, और अगर कैप्सूल डूब गया, तो सोवियत पनडुब्बियां उसे अमेरिका से पहले खोज सकती थीं। इसलिए, कैप्सूल को हवा में ही पकड़ने की योजना बनाई गई।
हवाई (Hawaii) द्वीप के पास प्रशांत महासागर के ऊपर ‘पैलिकन’ (Pelican) स्क्वाड्रन के जांबाज पायलट अपने C-119 और बाद में JC-130 हरक्यूलिस विमानों में गश्त करते रहते थे। इन विमानों के पीछे के दरवाजे खुले रहते थे और उनसे 60 फीट लंबे ‘विंच’ (Winch) और केबल लटके होते थे, जिनमें कांटे (Grappling hooks) लगे होते थे।
पायलटों को बादलों के बीच गिरते हुए उस छोटे से पैराशूट को खोजना होता था। जैसे ही वे पैराशूट को देखते, वे अपने भारी-भरकम विमान को 130 मील प्रति घंटे की रफ्तार से पैराशूट के ठीक ऊपर से गोता (Dive) लगाते हुए निकालते थे। विमान के पीछे लटके हुए कांटे पैराशूट की रस्सियों में उलझ जाते थे। यह एक ऐसा करतब था जिसमें एक सेकंड की भी देरी या विमान की गति में मामूली सी चूक का मतलब था—कैप्सूल का विमान के प्रोपेलर से टकराकर नष्ट हो जाना, या विमान का संतुलन बिगड़कर समुद्र में क्रैश हो जाना। जब कैप्सूल हवा में लटक जाता था, तो विमान के अंदर बैठे क्रू सदस्य उसे हाथ से खींचकर विमान के अंदर सुरक्षित रख लेते थे।
यह ‘मिड-एयर कैच’ (Mid-air catch) जासूसी इतिहास का सबसे बड़ा ‘लाइव एक्शन’ था, जिसने हॉलीवुड के स्टंट्स को भी बौना साबित कर दिया।
विफलता की पीड़ा और वह खौफनाक ‘डिस्कवरर’ कवर स्टोरी
किसी भी महान उपलब्धि की कहानी उसकी विफलताओं के बिना अधूरी है। छात्रों के लिए प्रोजेक्ट कोरोना का यह नकारात्मक (Bad) पहलू अध्ययन का एक बहुत बड़ा विषय है। यह प्रोजेक्ट रातों-रात सफल नहीं हुआ था। सीआईए ने इसे दुनिया की नजरों से छिपाने के लिए एक बहुत ही चतुर ‘कवर स्टोरी’ (बहानेबाजी) गढ़ी थी। उन्होंने पूरी दुनिया को बताया कि वे ‘डिस्कवरर’ (Discoverer) नाम का एक वैज्ञानिक और जैव-चिकित्सा (Biomedical) कार्यक्रम चला रहे हैं, जिसका उद्देश्य अंतरिक्ष में चूहों और बंदरों को भेजना है।
लेकिन ‘डिस्कवरर’ के शुरुआती दिन एक भयानक आपदा साबित हुए। 1959 से 1960 के बीच, एक के बाद एक लगातार 12 मिशन पूरी तरह से फेल हो गए। किसी रॉकेट में लॉन्च पैड पर ही विस्फोट हो गया, तो किसी का कैमरा अंतरिक्ष में जाकर काम करना बंद कर दिया। कुछ कैप्सूल अंतरिक्ष की कक्षा में ही भटक गए और कभी वापस नहीं आए।
सबसे खौफनाक घटना ‘डिस्कवरर 2’ (Discoverer 2) के साथ घटी। अप्रैल 1959 में, इस सैटेलाइट ने अंतरिक्ष से अपना कैप्सूल तो गिराया, लेकिन टाइमिंग की एक छोटी सी गलती के कारण वह प्रशांत महासागर के बजाय नॉर्वे के पास ‘स्वालबार्ड’ (Svalbard / Spitsbergen) के बर्फीले द्वीपों पर जा गिरा। यह इलाका सोवियत संघ के बहुत करीब था।
अमेरिकी खुफिया एजेंसियों में हड़कंप मच गया। उन्हें डर था कि केजीबी (KGB) को वह कैप्सूल मिल गया है और अब सोवियत संघ अमेरिकी तकनीक को रिवर्स-इंजीनियर (Reverse-engineer) कर लेगा। हालांकि, आधिकारिक रूप से वह कैप्सूल कभी नहीं मिला, लेकिन कई इतिहासकारों का मानना है कि सोवियत खुफिया एजेंटों ने उसे खोज निकाला था। इन लगातार 12 विफलताओं ने सीआईए के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को मानसिक रूप से तोड़ कर रख दिया था। अरबों डॉलर पानी में बह चुके थे और राष्ट्रपति आइजनहावर का धैर्य जवाब दे रहा था।
अगस्त का वह चमत्कार और ‘मिसाइल गैप’ के मिथक का अंत
कहते हैं कि सबसे गहरी रात के बाद ही सबसे चमकदार सुबह होती है। अगस्त 1960 का महीना अमेरिकी खुफिया इतिहास में एक ऐसे चमत्कार के रूप में दर्ज है, जिसने सारी विफलताओं के घाव भर दिए।
10 अगस्त 1960 को, ‘डिस्कवरर 13’ (Discoverer 13) ने सफलतापूर्वक अपना कैप्सूल धरती पर वापस भेजा। हालांकि विमान उसे हवा में नहीं पकड़ पाए और वह समुद्र में गिर गया, लेकिन अमेरिकी नौसेना के गोताखोरों ने उसे डूबने से पहले ही निकाल लिया। यह मानव इतिहास में पहली बार था जब अंतरिक्ष से कोई मानव-निर्मित वस्तु सुरक्षित धरती पर वापस लाई गई थी (यह भी एक महत्वपूर्ण ‘डेटा पॉइंट’ है कि अमेरिका ने यह उपलब्धि सोवियत संघ से पहले हासिल की थी)।
लेकिन असली इतिहास लिखा गया 18 अगस्त 1960 को। इस दिन ‘डिस्कवरर 14’ (Discoverer 14) मिशन का कैप्सूल अंतरिक्ष से नीचे आया। प्रशांत महासागर के ऊपर उड़ रहे कैप्टन हेरोल्ड मिशेल (Harold Mitchell) ने अपने C-119 विमान को एक सटीक गोता लगाया और हवा में ही उस कैप्सूल को पकड़ लिया। विमान के अंदर बैठे क्रू ने जब उस गर्म कैप्सूल को छुआ, तो वे खुशी से रो पड़े।
जब उस कैप्सूल की फिल्म को वाशिंगटन डी.सी. लाया गया और डार्करूम में धोया गया, तो जो तस्वीरें सामने आईं, उन्होंने सीआईए के विश्लेषकों की आंखें फटी की फटी रह गईं। ‘डिस्कवरर 14’ के उस एक मिशन ने सोवियत संघ के 1.6 मिलियन (16 लाख) वर्ग मील क्षेत्र की तस्वीरें ली थीं। यह कवरेज पिछले 4 सालों में उड़ाए गए सभी 24 U-2 जासूसी विमानों के कवरेज से भी ज्यादा था।
इन तस्वीरों ने अमेरिका के कूटनीतिक और रक्षा परिदृश्य में एक भूचाल ला दिया। इन तस्वीरों का सबसे बड़ा और सकारात्मक (Good) परिणाम यह हुआ कि ‘मिसाइल गैप’ का वह डरावना मिथक हमेशा के लिए टूट गया।
सीआईए ने तस्वीरों का विश्लेषण करके राष्ट्रपति को एक रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में यह साफ हो गया था कि सोवियत संघ कोई ‘सॉसेज की तरह’ मिसाइलें नहीं बना रहा है। उनके पास उस समय सैकड़ों नहीं, बल्कि मात्र 10 से 15 काम करने लायक इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें थीं। सोवियत नेता ख्रुश्चेव पूरी दुनिया से एक बहुत बड़ा सफेद झूठ बोल रहे थे।
इस एक खुफिया जानकारी ने तीसरे विश्व युद्ध को रोक दिया। अगर अमेरिका को यह न पता चलता कि सोवियत संघ वास्तव में कमजोर है, तो हो सकता था कि अमेरिकी सेना अपनी सुरक्षा के डर से सोवियत संघ पर ‘प्री-एम्प्टिव’ (पहला) परमाणु हमला कर देती। प्रोजेक्ट कोरोना ने अमेरिका को वह ‘रणनीतिक धैर्य’ (Strategic Patience) प्रदान किया, जिसने शीत युद्ध को ‘गर्म युद्ध’ में बदलने से रोका।
360-डिग्री समीक्षा: जीत की कीमत, अंतरिक्ष का कचरा और एक नई सुबह
किसी भी ऐतिहासिक और वैज्ञानिक मिशन का मूल्यांकन केवल उसकी सफलताओं से नहीं किया जा सकता। एक निष्पक्ष विश्लेषक के तौर पर हमें प्रोजेक्ट कोरोना के गुड, बैड और न्यूट्रल—तीनों पहलुओं को एक ही धागे में पिरोकर देखना होगा।
यह मिशन कूटनीतिक दृष्टिकोण से एक पूर्ण विजय था। 1960 से 1972 तक चले इस प्रोजेक्ट ने कुल 145 उड़ानें भरीं और सोवियत संघ, चीन और मध्य-पूर्व के लाखों वर्ग मील क्षेत्र का नक्शा तैयार किया। इसने 1962 के ‘क्यूबन मिसाइल क्राइसिस’ (Cuban Missile Crisis) से लेकर 1967 के ‘सिक्स डे वॉर’ तक, हर बड़े युद्ध में अमेरिका को एक अजेय बढ़त दिलाई। यह ‘द गुड’ (सकारात्मक) पहलू था जिसने दुनिया को परमाणु प्रलय से बचाया।
लेकिन इसका ‘नकारात्मक’ (Bad) पहलू भी कम खौफनाक नहीं था। इस प्रोजेक्ट ने अमेरिकी करदाताओं के अरबों डॉलर उन शुरुआती विफलताओं में बर्बाद कर दिए, जिनका कोई हिसाब नहीं था। इसके अलावा, मिड-एयर कैच करने वाले विमानों के पायलट हर पल अपनी जान जोखिम में डालते थे। एक छोटी सी गलती से विमान क्रैश हो सकता था। सबसे बड़ा और दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पर्यावरण और अंतरिक्ष पर पड़ा। कोरोना प्रोजेक्ट ने अंतरिक्ष की कक्षा में भारी मात्रा में ‘स्पेस डेब्रिस’ (Space Debris – अंतरिक्ष का कचरा) छोड़ दिया। जो कैप्सूल समुद्र में खो गए, उनमें से कई में ‘पॉलोनियम’ (Polonium) जैसे रेडियोएक्टिव तत्व और भारी धातुएं थीं, जो आज भी महासागरों की गहराइयों में पड़े हुए हैं।
अगर हम इसके ‘तटस्थ’ (Neutral) या दीर्घकालिक नागरिक प्रभावों की बात करें, तो प्रोजेक्ट कोरोना ने पूरी दुनिया को देखने का हमारा नजरिया बदल दिया। 1995 में, राष्ट्रपति बिल क्लिंटन (Bill Clinton) ने एक ऐतिहासिक कार्यकारी आदेश (Executive Order) पर हस्ताक्षर करके ‘प्रोजेक्ट कोरोना’ की 8 लाख से अधिक तस्वीरों को ‘डीक्लासिफाई’ (सार्वजनिक) कर दिया।
आज ये तस्वीरें केवल सैन्य जासूसी का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये विज्ञान के लिए एक खजाना बन चुकी हैं। पर्यावरणविद् इन 1960 के दशक की तस्वीरों का उपयोग करके आज के ‘क्लाइमेट चेंज’ (Climate Change) और सिकुड़ते हुए ग्लेशियरों का अध्ययन कर रहे हैं। दुनिया भर के पुरातत्वविद् (Archaeologists) इन पुरानी तस्वीरों का उपयोग करके सीरिया और इराक के रेगिस्तानों में छिपे हुए प्राचीन शहरों की खोज कर रहे हैं, क्योंकि 1960 के दशक में उन इलाकों में शहरीकरण (Urbanization) नहीं हुआ था।
अंतिम निष्कर्ष: अदृश्य आँखों की विरासत
प्रोजेक्ट कोरोना की कहानी यह साबित करती है कि इंसान का दिमाग संकट के समय में किस हद तक काम कर सकता है। जब अमेरिका के हाथ-पैर बांध दिए गए थे, तो उन्होंने सीधे आसमान को ही अपनी आंखें बना लिया। अंतरिक्ष से फिल्म के डिब्बों को नीचे गिराना और उन्हें हवा में लपकना एक ऐसा विचार था जो सुनने में किसी पागल का प्रलाप लगता है, लेकिन इसी पागलपन ने दुनिया को एक नई दिशा दी।
1972 में डिजिटल ट्रांसमिशन के आविष्कार के बाद कोरोना प्रोजेक्ट को बंद कर दिया गया और उसकी जगह रियल-टाइम डेटा भेजने वाले ‘कीहोल’ (Keyhole) सैटेलाइट्स ने ले ली। लेकिन जब भी आप आज अपने फोन पर ‘जीपीएस’ (GPS) या सैटेलाइट मैप खोलते हैं, तो आपको उन गुमनाम वैज्ञानिकों और उन जांबाज पायलटों को धन्यवाद देना चाहिए, जिन्होंने प्रशांत महासागर के ऊपर बादलों के बीच अपनी जान हथेली पर रखकर उस पहले पैराशूट को लपका था।