ऑपरेशन रुबिकॉन – सदी की सबसे बड़ी ‘खुफिया डकैती’, जब 50 साल तक सीआईए दुनिया को ‘जासूसी’ बेचती रही

by V iS iO iN 2 min read

संडे विशेष कवर स्टोरी: ऑपरेशन रुबिकॉन – सदी की सबसे बड़ी ‘खुफिया डकैती’, जब 50 साल तक सीआईए दुनिया को ‘जासूसी’ बेचती रही

जासूसी की खौफनाक और रहस्यमयी दुनिया में एक बहुत ही पुरानी कहावत है: “अगर आप दुश्मन के ताले की चाबी चुरा लेते हैं, तो आप एक बेहतरीन जासूस हैं। लेकिन अगर आप खुद वह ताला बनाकर दुश्मन को भारी कीमत पर बेचते हैं और उसकी ‘मास्टर-की’ (Master Key) हमेशा के लिए अपनी जेब में रखते हैं, तो आप इतिहास के सबसे बड़े मास्टरमाइंड हैं।” जब हम अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और खुफिया ऑपरेशन्स का अध्ययन करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान हैकर्स, अंडरकवर एजेंट्स या सैटेलाइट्स पर जाता है। लेकिन आज हम जिस खुफिया ऑपरेशन की फाइल खोलने जा रहे हैं, उसने जेम्स बॉन्ड की कहानियों को भी बच्चों का खेल साबित कर दिया। यह कोई एक दिन, एक महीने या एक साल का ऑपरेशन नहीं था। यह पूरे 50 साल (आधी सदी) तक चलने वाला एक ऐसा ‘इंटेलिजेंस हाइस्ट’ (Intelligence Heist) या खुफिया डकैती थी, जिसमें दुनिया के 120 से अधिक देशों ने अपनी सबसे गहरी और अति-गोपनीय राष्ट्रीय सुरक्षा की जानकारी खुद अपने हाथों से अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) और पश्चिमी जर्मनी की खुफिया एजेंसी बीएनडी (BND) को सौंपी।

यह कहानी है ‘ऑपरेशन रुबिकॉन’ (Operation Rubicon) की, जिसे शुरुआती दौर में ‘ऑपरेशन थिसॉरस’ (Operation Thesaurus) कहा जाता था। यह एक ऐसी खौफनाक ऐतिहासिक सच्चाई है, जिसने साबित कर दिया कि शीत युद्ध के दौरान कूटनीतिक ‘तटस्थता’ (Neutrality) का सबसे बड़ा मुखौटा पहनकर किस तरह पूरी दुनिया को मूर्ख बनाया गया। रक्षा और कूटनीति के छात्रों के लिए, यह घटना ‘सप्लाई चेन कॉम्प्रोमाइज’ (Supply Chain Compromise) का दुनिया का पहला और सबसे सटीक उदाहरण है। आइए, बिना किसी बुलेट पॉइंट या पारंपरिक सूचियों के, एक थ्रिलर उपन्यास की तरह इस ऐतिहासिक धोखे की परतों को खोलते हैं और समझते हैं कि कैसे करोड़ों डॉलर का भुगतान करके देशों ने खुद अपनी जासूसी करवाई।

स्विस तटस्थता का भ्रम और एक ‘मैकेनिकल जीनियस’ का उदय

इस पूरी कहानी के केंद्र में एक स्विस कंपनी थी, जिसका नाम था ‘क्रिप्टो एजी’ (Crypto AG)। इस कंपनी की स्थापना एक रूसी मूल के स्वीडिश आविष्कारक बोरिस हेगेलिन (Boris Hagelin) ने की थी। हेगेलिन कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। जब 1917 की रूसी क्रांति के बाद उनका परिवार भागकर स्वीडन आ गया, तो उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में महारत हासिल की और ‘एन्क्रिप्शन मशीनों’ (Encryption Machines – गुप्त कोड बनाने वाली मशीनें) का निर्माण शुरू किया।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, जब अमेरिका युद्ध में उतरा, तो उन्हें युद्ध के मैदान में अपने संदेशों को सुरक्षित रखने के लिए एक हल्की और पोर्टेबल एन्क्रिप्शन मशीन की आवश्यकता थी। बोरिस हेगेलिन ने अमेरिका को अपनी M-209 (C-38) मशीन का डिज़ाइन दिया। अमेरिकी सेना ने युद्ध के दौरान ऐसी लगभग 140,000 मशीनें बनाईं। इस सौदे ने हेगेलिन को करोड़पति बना दिया और उन्हें अमेरिकी खुफिया तंत्र के बहुत करीब ला खड़ा किया। युद्ध के बाद, हेगेलिन स्विट्जरलैंड चले गए और वहां ‘क्रिप्टो एजी’ की स्थापना की।

स्विट्जरलैंड को चुनने के पीछे एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण था। स्विट्जरलैंड दुनिया भर में अपनी ‘तटस्थता’ (Neutrality) और ‘स्विस बैंक’ जैसी गोपनीयता के लिए जाना जाता था। विकासशील देशों, खाड़ी देशों और सोवियत संघ के प्रभाव वाले देशों को लगता था कि अगर वे अमेरिका या रूस से रक्षा उपकरण खरीदेंगे, तो उसमें जासूसी का खतरा हो सकता है। लेकिन स्विट्जरलैंड? स्विट्जरलैंड तो किसी का दुश्मन नहीं था। इसलिए, जब ‘क्रिप्टो एजी’ ने अपनी एन्क्रिप्शन मशीनें बाजार में उतारीं, तो पूरी दुनिया ने आँख मूंदकर उन पर भरोसा कर लिया।

लेकिन दुनिया को यह नहीं पता था कि 1951 में, बोरिस हेगेलिन और अमेरिकी ‘क्रिप्टोलॉजी के जनक’ कहे जाने वाले विलियम फ्रीडमैन (William Friedman) के बीच एक गुप्त ‘सज्जन समझौता’ (Gentlemen’s Agreement) हो चुका था। इस समझौते के तहत, हेगेलिन ने अमेरिका को वचन दिया था कि वह अपनी सबसे उन्नत और सुरक्षित मशीनें केवल अमेरिका के मित्र देशों को बेचेंगे, और बाकी दुनिया को जो मशीनें बेची जाएंगी, उनके कोड्स को अमेरिकी खुफिया एजेंसी (NSA) आसानी से पढ़ सकेगी।

‘मिनर्वा’ का मुखौटा: जब खुफिया एजेंसियों ने पूरी कंपनी ही खरीद ली

1960 के दशक के अंत तक, बोरिस हेगेलिन बूढ़े हो रहे थे और वे अपनी कंपनी के भविष्य को लेकर चिंतित थे। दूसरी ओर, सीआईए और पश्चिमी जर्मनी की बीएनडी को डर था कि अगर हेगेलिन के बाद यह कंपनी किसी गलत हाथों (जैसे फ्रांसीसी या सोवियत) में चली गई, तो उनके लिए दुनिया भर के कोड्स पढ़ना असंभव हो जाएगा।

यहीं पर इतिहास का सबसे दुस्साहसिक कूटनीतिक और कॉर्पोरेट अधिग्रहण हुआ। 1970 में, सीआईए और बीएनडी ने मिलकर ‘क्रिप्टो एजी’ को पूरी तरह से खरीद लिया। इस खरीद को दुनिया से छिपाने के लिए लिकटेंस्टीन (Liechtenstein) देश में ‘मिनर्वा’ (Minerva) नाम की एक फर्जी कानूनी फर्म (Shell Company) बनाई गई। इस शेल कंपनी के जरिए दोनों खुफिया एजेंसियों ने लगभग 5.75 मिलियन डॉलर (उस समय की एक बहुत बड़ी रकम) का भुगतान करके ‘क्रिप्टो एजी’ का 100% मालिकाना हक हासिल कर लिया।

इस ऑपरेशन का कोडनेम ‘थिसॉरस’ रखा गया, जिसे 1980 के दशक के अंत में बदलकर ‘ऑपरेशन रुबिकॉन’ कर दिया गया। अब सीआईए और बीएनडी केवल बाहर से कोड नहीं तोड़ रहे थे; वे खुद फैक्ट्री के मालिक थे। उन्होंने कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में अपने चुने हुए आदमियों को बैठाया और अपने गुप्त इंजीनियरों (क्रिप्टोग्राफर्स) को कंपनी के रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) विभाग में घुसा दिया।

इस खुफिया खेल का विज्ञान (Tradecraft) समझना छात्रों के लिए बेहद दिलचस्प है। क्रिप्टो एजी की मशीनें दिखने में बिल्कुल एक जैसी होती थीं। लेकिन सीआईए और एनएसए के इंजीनियरों ने उन मशीनों के ‘एल्गोरिदम’ (Algorithms) और ‘स्यूडो-रैंडम नंबर जनरेटर’ (Pseudorandom number generator) के अंदर एक ऐसा गणितीय ‘बैकडोर’ (Backdoor) डाल दिया था, जो केवल उन्हें पता था।

जब कोई देश (जैसे भारत, पाकिस्तान, ईरान या वेटिकन) इस मशीन का उपयोग करके अपना कोई टॉप-सीक्रेट संदेश टाइप करता था, तो मशीन उसे एक ऐसे जटिल कोड में बदल देती थी जो उस देश के राजनेताओं और जनरलों को ‘अभेद्य’ (Unbreakable) लगता था। लेकिन एनएसए के सुपर-कंप्यूटरों के पास वह अदृश्य मास्टर-की थी, जिससे वे उस संदेश को उसी क्षण ‘डिकोड’ (Decipher) कर लेते थे, जैसे कि वे उसे किसी खुली किताब की तरह पढ़ रहे हों।

कूटनीति का ‘मास्टरस्ट्रोक’: वे ऐतिहासिक युद्ध, जो बंद कमरों में जीते गए

अगर हम इस ऑपरेशन के सामरिक और रणनीतिक परिणामों का एक तटस्थ और 360-डिग्री विश्लेषण करें, तो इसके ‘सकारात्मक’ (अमेरिकी और पश्चिमी दृष्टिकोण से) परिणाम इतने अचूक थे कि उन्होंने वैश्विक इतिहास की दिशा ही बदल दी। अमेरिका और पश्चिमी जर्मनी को न केवल पूरी दुनिया की गुप्त कूटनीतिक और सैन्य चालों की रियल-टाइम जानकारी मिल रही थी, बल्कि मजे की बात यह थी कि इसके लिए उन्हें पैसे भी मिल रहे थे! देश इन मशीनों को खरीदने के लिए लाखों डॉलर चुकाते थे, और वह पैसा सीधे सीआईए और बीएनडी के गुप्त फंड में जाता था।

आइए इसके कुछ सबसे ऐतिहासिक उदाहरणों (Data Points) पर गौर करें, जिन्होंने इस ऑपरेशन को सीआईए की सदी की सबसे बड़ी सफलता बना दिया:

1. 1978 का कैंप डेविड समझौता (Camp David Accords): जब अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर (Jimmy Carter) मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात (Anwar Sadat) और इजरायली प्रधानमंत्री मेनाकेम बेगिन (Menachem Begin) के बीच ऐतिहासिक शांति वार्ता करा रहे थे, तो अमेरिका के पास एक बहुत बड़ा ‘अनुचित लाभ’ (Unfair Advantage) था। मिस्र के राष्ट्रपति सादात अपने देश में अपने कैबिनेट मंत्रियों से जो भी गुप्त चर्चाएं कर रहे थे, वे ‘क्रिप्टो एजी’ की मशीनों से भेजी जा रही थीं। अमेरिकी वार्ताकार यह पहले से जानते थे कि मिस्र किस बात पर राजी होगा और उनकी अंतिम शर्तें क्या हैं। पोकर के खेल में, अमेरिका मिस्र के पत्ते पहले ही देख चुका था।

2. 1979 का ईरान बंधक संकट (Iran Hostage Crisis): जब ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई और 1979 में कट्टरपंथी छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा करके 52 अमेरिकियों को बंधक बना लिया, तो सीआईए ने ईरानी नेतृत्व (अयातुल्ला खुमैनी के प्रशासन) के बीच होने वाले 85% से अधिक संचार को पढ़ लिया था। हालांकि वे बंधकों को तुरंत नहीं छुड़ा पाए, लेकिन ईरान की हर कूटनीतिक चाल और अलजीरिया के साथ उनकी मध्यस्थता की हर शर्त अमेरिका की मेज पर होती थी, क्योंकि अयातुल्ला के मौलवी भी स्विट्जरलैंड की उसी ‘भरोसेमंद’ कंपनी की मशीनों का इस्तेमाल कर रहे थे।

3. 1982 का फॉकलैंड युद्ध (The Falklands War): जब अर्जेंटीना की सैन्य तानाशाही ने ब्रिटेन के फॉकलैंड द्वीपों पर कब्जा कर लिया, तो ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर (Margaret Thatcher) ने युद्ध की घोषणा कर दी। अमेरिका ने गुप्त रूप से ब्रिटेन का साथ दिया। अर्जेंटीना की सेना ‘क्रिप्टो एजी’ के उपकरणों का भारी उपयोग करती थी। एनएसए ने अर्जेंटीना के सैन्य कमांडरों के हर आदेश, उनकी नौसेना की हर हलचल और वायुसेना के हर हमले की जानकारी सीधे ब्रिटेन के खुफिया मुख्यालय (GCHQ) को सौंप दी। अर्जेंटीना के जनरलों को कभी समझ ही नहीं आया कि ब्रिटिश सेना को उनके हर कदम का पहले से कैसे पता चल जाता था।

4. 1986 का लीबिया धमाका और रोनाल्ड रीगन का ‘अहंकार’: अप्रैल 1986 में, पश्चिमी बर्लिन के ‘ला बेले’ (La Belle) डिस्कोथेक में एक भयानक बम धमाका हुआ, जिसमें दो अमेरिकी सैनिक मारे गए। अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन (Ronald Reagan) ने कुछ ही दिनों बाद राष्ट्रीय टेलीविजन पर आकर सीधे लीबिया के तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी (Muammar Gaddafi) को जिम्मेदार ठहराया। रीगन ने कहा कि अमेरिका के पास ‘सटीक और पुख्ता प्रमाण’ हैं कि गद्दाफी ने पूर्वी बर्लिन में अपने दूतावास को हमले की बधाई का संदेश भेजा है। रीगन यह बताना भूल गए थे कि उन्हें यह जानकारी कैसे मिली। लीबिया का दूतावास ‘क्रिप्टो एजी’ की मशीन इस्तेमाल कर रहा था। रीगन के इस बयान ने खुफिया हलकों में भारी खलबली मचा दी थी, क्योंकि इससे गद्दाफी (और अन्य देशों) को शक हो गया था कि उनके कूटनीतिक चैनल सुरक्षित नहीं हैं। यह खुफिया इतिहास का वह क्षण था जब एक राजनेता के ‘पीआर’ (Public Relations) के कारण एक गुप्त ऑपरेशन खतरे में पड़ गया था।

भरोसे का कत्ल: एक निर्दोष सेल्समैन की गिरफ्तारी और दरकती दीवारें

लेकिन जैसा कि इतिहास का नियम है, झूठ का महल चाहे कितना भी ऊंचा क्यों न हो, एक दिन उसकी दीवारें दरकने लगती हैं। ‘ऑपरेशन रुबिकॉन’ का सबसे बड़ा ‘नकारात्मक’ (Bad) पहलू और इसकी नैतिक दिवालियेपन की कहानी 1992 में सामने आई।

यह समझना जरूरी है कि ‘क्रिप्टो एजी’ में काम करने वाले सैकड़ों आम कर्मचारियों (इंजीनियरों, सेल्समैन और क्लर्कों) को इस बात की भनक तक नहीं थी कि वे असल में सीआईए के लिए काम कर रहे हैं। उन्हें लगता था कि वे एक प्रामाणिक स्विस कंपनी का हिस्सा हैं। इन्हीं में से एक थे— हैंस बुहलर (Hans Bühler)। हैंस कंपनी के सबसे बेहतरीन सेल्समैन थे और उनका मुख्य इलाका मध्य-पूर्व था।

मार्च 1992 में, जब हैंस बुहलर उपकरणों की बिक्री के सिलसिले में ईरान की राजधानी तेहरान पहुंचे, तो ईरानी खुफिया एजेंसी (SAVAK/MOIS) ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। ईरानियों को (रीगन के 1986 के बयान और अन्य घटनाओं के बाद) शक हो गया था कि ‘क्रिप्टो एजी’ की मशीनें लीक कर रही हैं। हैंस बुहलर को ईरान की कुख्यात एविन जेल (Evin Prison) में डाल दिया गया।

हैंस बुहलर बिल्कुल निर्दोष थे। उन्होंने 9 महीने तक एकांत कारावास (Solitary Confinement) और खौफनाक पूछताछ का सामना किया, लेकिन उन्होंने कोई राज़ नहीं उगला क्योंकि उनके पास कोई राज़ था ही नहीं! उन्हें सच में पता नहीं था कि मशीनें ‘रिग्ड’ (Rigged) हैं।

इस घटना का सबसे अमानवीय हिस्सा यह था कि ‘क्रिप्टो एजी’ (यानी सीआईए और बीएनडी) ने हैंस को बचाने के लिए कोई कूटनीतिक प्रयास नहीं किया, क्योंकि इससे उनका रहस्य खुल जाता। अंततः 9 महीने बाद, पश्चिमी जर्मनी की बीएनडी ने चुपचाप ‘क्रिप्टो एजी’ के खाते से 1 मिलियन डॉलर (रंगदारी/जमानत) ईरान को दिए, तब जाकर हैंस की रिहाई हुई।

जब हैंस बुहलर स्विट्जरलैंड वापस आए और उन्होंने कंपनी से सवाल पूछना शुरू किया, तो कंपनी ने उन्हें तुरंत नौकरी से निकाल दिया और चुप रहने के लिए पैसे दिए। इस एक घटना ने पश्चिमी जर्मनी की बीएनडी को अंदर तक हिला दिया। बीएनडी के अधिकारियों को लगने लगा था कि शीत युद्ध खत्म (1991) हो चुका है और अब इस तरह के ‘अनैतिक’ व्यापारिक धोखे का राजनीतिक जोखिम बहुत अधिक है। 1993 में, बीएनडी ने ‘ऑपरेशन रुबिकॉन’ से अपने हाथ खींच लिए और सीआईए को अपना हिस्सा (लगभग 17 मिलियन डॉलर में) बेच दिया। लेकिन सीआईए नहीं रुकी। सीआईए ने अकेले ही 2018 तक इस कंपनी का गुप्त संचालन जारी रखा और दुनिया की जासूसी करती रही।

2020 का पर्दाफाश: ‘शताब्दी का खुफिया तख्तापलट’ और आज की दुनिया

फरवरी 2020 में, इस 50 साल पुराने रहस्य से पूरी तरह पर्दा तब उठा, जब अमेरिकी अखबार ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ (The Washington Post) और जर्मन ब्रॉडकास्टर ‘ज़ेडडीएफ’ (ZDF) ने सीआईए और बीएनडी के लीक हुए आंतरिक दस्तावेजों के आधार पर एक संयुक्त इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट प्रकाशित की।

सीआईए के ही एक आधिकारिक (लेकिन गुप्त) इतिहासकार ने इन दस्तावेजों में ‘ऑपरेशन रुबिकॉन’ को “शताब्दी का खुफिया तख्तापलट” (The intelligence coup of the century) कहा था। जब यह रिपोर्ट दुनिया के सामने आई, तो स्विट्जरलैंड की अंतरराष्ट्रीय साख को गहरा धक्का लगा। स्विस सरकार ने तुरंत जांच के आदेश दिए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। स्विस तटस्थता का वह पवित्र आवरण हमेशा के लिए तार-तार हो चुका था।

एक तटस्थ और कूटनीतिक विश्लेषक के तौर पर, जब हम इस घटना के दीर्घकालिक प्रभावों को देखते हैं, तो यह केवल एक शीत-युद्ध की कहानी नहीं रह जाती। इस ऑपरेशन ने भारत (जिसने दशकों तक इसके उपकरण इस्तेमाल किए), पाकिस्तान, लैटिन अमेरिका के तानाशाहों (ऑपरेशन कोंडोर के दौरान), वेटिकन सिटी और संयुक्त राष्ट्र (UN) तक की जासूसी की।

इस घटना का सबसे बड़ा नैतिक और कूटनीतिक प्रभाव यह है कि इसने साबित कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में ‘भरोसा’ (Trust) एक भ्रम है। विकसित राष्ट्रों (अमेरिका और जर्मनी) ने विकासशील और गुटनिरपेक्ष (Non-Aligned) देशों की रक्षा चिंताओं का एक क्रूर व्यावसायिक और कूटनीतिक शोषण किया। उन्होंने न केवल संप्रभु राष्ट्रों की जासूसी की, बल्कि अपने बजट को भरने के लिए उन गरीब राष्ट्रों का पैसा भी चूसा।

निष्कर्ष: डिजिटल युग में बैकडोर्स का खौफनाक साया

‘ऑपरेशन रुबिकॉन’ और ‘क्रिप्टो एजी’ की कहानी इतिहास का कोई बंद अध्याय नहीं है; यह आज की साइबर सुरक्षा (Cybersecurity) का सबसे प्रासंगिक और खौफनाक सबक है।

आज जब हम 5G नेटवर्क के लिए चीनी कंपनी ‘हुआवे’ (Huawei) के उपकरणों का बहिष्कार करने की अमेरिकी चेतावनियां सुनते हैं, या जब हम ‘पेगासस’ (Pegasus) जैसे स्पाईवेयर की बात करते हैं, तो हमें ‘क्रिप्टो एजी’ की याद आनी चाहिए। अमेरिका आज जिन चीनी या रूसी कंपनियों पर हार्डवेयर में ‘बैकडोर’ (चोर दरवाजे) छोड़ने का आरोप लगाता है, वास्तव में उस ‘सप्लाई चेन जासूसी’ का आविष्कार खुद अमेरिका ने 50 साल पहले स्विट्जरलैंड की शांत वादियों में किया था।

यह ऐतिहासिक डकैती हमें सिखाती है कि जब आप राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए किसी विदेशी ब्लैक-बॉक्स (तकनीक) को खरीदते हैं, तो आप केवल एक मशीन नहीं खरीद रहे होते; आप अपनी संप्रभुता का एक हिस्सा उस विदेशी शक्ति के हाथों में गिरवी रख रहे होते हैं। सूचना के इस युग में, अगर आपने अपना ताला खुद नहीं बनाया है, तो मान कर चलिए कि उसकी एक चाबी किसी और की जेब में जरूर है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *