इतिहास के सबसे बड़े भ्रम अक्सर तब जन्म लेते हैं जब एक राष्ट्र अपनी ताकत के नशे में इतना चूर हो जाता है कि वह सच्चाई की उन चीखों को भी अनसुना कर देता है, जो सीधे उसके दरवाजे पर दस्तक दे रही होती हैं। जासूसी और सैन्य खुफिया तंत्र की दुनिया में, इसे ‘ग्रुपथिंक’ (Groupthink) या सामूहिक सोच का जाल कहा जाता है। यह एक ऐसी मनोवैज्ञानिक बीमारी है जहां बेहद बुद्धिमान और तार्किक लोगों का समूह भी एकमत रहने की जिद में, विपरीत चेतावनी और कड़वे सच को नकार देता है।
छात्रों, रक्षा विश्लेषकों और मनोवैज्ञानिकों के लिए 1973 का ‘योम किप्पुर युद्ध’ (Yom Kippur War) किसी युद्धक्षेत्र की कहानी से कहीं अधिक एक ‘माइंड-गेम’ और खुफिया विफलता की सबसे बड़ी केस स्टडी है। यह कहानी है मध्य पूर्व के सबसे शक्तिशाली देश इज़रायल की, जिसकी खुफिया एजेंसी ‘अमन’ (Aman – Military Intelligence) ने 6 अक्टूबर 1973 को मिस्र और सीरिया के एक अभूतपूर्व संयुक्त हमले की उन अनगिनत चेतावनियों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया था, जो महीनों से उनकी मेज पर आ रही थीं। आइए, तारीखों, सटीक आंकड़ों और खुफिया दुनिया के उन गुमनाम नायकों और खलनायकों के साथ इस ऐतिहासिक घटना का ‘नैरेटिव’ विश्लेषण करते हैं, और समझते हैं कि कैसे एक ‘कांसेप्ट’ (अवधारणा) ने हजारों सैनिकों की जान ले ली।
1967 का नशा और ‘द कॉन्सेप्ट’ (Ha-Konceptzia) का जन्म
इस खुफिया विफलता की जड़ें 1973 में नहीं, बल्कि छह साल पहले 1967 में हुए ‘सिक्स-डे वॉर’ (Six-Day War) में छिपी थीं। उस युद्ध में इज़रायल ने मात्र छह दिनों के भीतर मिस्र, सीरिया और जॉर्डन की संयुक्त सेनाओं को धूल चटा दी थी। इज़रायल ने मिस्र से सिनाई प्रायद्वीप (Sinai Peninsula), सीरिया से गोलान हाइट्स (Golan Heights) और जॉर्डन से वेस्ट बैंक (West Bank) छीन लिया था।
इस एकतरफा और चमत्कारी जीत ने इज़रायली सेना (IDF) और उसके राजनीतिक नेतृत्व, विशेषकर रक्षा मंत्री मोशे दयान (Moshe Dayan) और सैन्य खुफिया प्रमुख (Aman) मेजर जनरल एली ज़ीरा (Eli Zeira) के भीतर अजेय होने का एक गहरा अहंकार (Hubris) भर दिया था। उन्हें लगने लगा था कि अरब देश इतने कमजोर और डरे हुए हैं कि वे आने वाले कई दशकों तक इज़रायल की तरफ आँख उठाकर देखने की हिम्मत भी नहीं कर सकते।
इसी अहंकार की कोख से जन्म हुआ उस सिद्धांत का, जिसे इज़रायली खुफिया हलकों में हिब्रू भाषा में ‘हा-कॉन्सेप्ट्ज़िया’ (Ha-Konceptzia) या केवल ‘द कॉन्सेप्ट’ कहा गया। इस अवधारणा के मुख्य रूप से दो पक्के नियम थे।
पहला: सीरिया कभी भी इज़रायल पर तब तक अकेला हमला नहीं करेगा, जब तक कि मिस्र उसके साथ न हो। और दूसरा (जो सबसे घातक था): मिस्र इज़रायल पर तब तक हमला नहीं कर सकता, जब तक कि उसके पास इज़रायली वायुसेना (IAF) का मुकाबला करने के लिए सोवियत संघ के लंबी दूरी के ‘मिग-23’ (MiG-23) बमवर्षक विमान और तेल अवीव को तबाह करने में सक्षम ‘स्कड मिसाइलें’ (Scud Missiles) न आ जाएं।
मेजर जनरल एली ज़ीरा को पूरा यकीन था कि चूंकि मिस्र के पास अभी तक ये हथियार पर्याप्त मात्रा में नहीं हैं, इसलिए युद्ध की कोई संभावना ही नहीं है। ‘द कॉन्सेप्ट’ एक पत्थर की लकीर बन गया था। अगर कोई भी खुफिया रिपोर्ट इस ‘कॉन्सेप्ट’ से मेल नहीं खाती थी, तो एली ज़ीरा उसे सिरे से खारिज कर देते थे। मनोवैज्ञानिक इसे ‘संज्ञानात्मक असंगति’ (Cognitive Dissonance) कहते हैं—जब इंसान अपने विश्वास के खिलाफ जाने वाले तथ्यों को देखने से ही इनकार कर देता है।
अनसुनी चेतावनियाँ और ‘ऑपरेशन बद्र’ का धोखा
दूसरी तरफ, मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात (Anwar Sadat) इज़रायल की इसी मनोवैज्ञानिक कमजोरी का फायदा उठा रहे थे। सादात ने सीरिया के राष्ट्रपति हाफेज़ अल-असद (Hafez al-Assad) के साथ मिलकर इज़रायल पर दो मोर्चों (सिनाई और गोलान हाइट्स) से अचानक हमला करने की एक टॉप-सीक्रेट योजना बनाई, जिसका कोडनेम था ‘ऑपरेशन बद्र’ (Operation Badr)।
सादात जानते थे कि इज़रायल की खुफिया पकड़ बहुत मजबूत है, इसलिए उन्होंने ‘धोखे की रणनीति’ (Deception Strategy) का सहारा लिया। मई 1973 से लेकर अगस्त 1973 तक, मिस्र ने स्वेज नहर (Suez Canal) के पास कई बार अपनी सेना जुटाई और फिर उसे वापस बुला लिया। इज़रायल ने हर बार इसे युद्ध का खतरा मानकर अपनी रिज़र्व सेना को ‘मोबिलाइज़’ (Mobilize) किया, जिसमें इज़रायल को लाखों डॉलर का नुकसान हुआ। जब हमला नहीं हुआ, तो इज़रायली खुफिया तंत्र को लगने लगा कि मिस्र केवल गीदड़भभकी दे रहा है। इसे ‘क्राई वुल्फ सिंड्रोम’ (Cry Wolf Syndrome – भेड़िया आया कहानी वाला प्रभाव) कहा जाता है।
लेकिन अक्टूबर 1973 के पहले सप्ताह में, कुछ ऐसा हो रहा था जिसे नज़रअंदाज़ करना किसी भी सामान्य खुफिया अधिकारी के लिए असंभव था। आइए उन सटीक चेतावनियों (Data Points) पर गौर करें, जिन्हें ‘ग्रुपथिंक’ के नशे में चूर इज़रायली नेतृत्व ने रद्दी में डाल दिया:
1. जॉर्डन के किंग हुसैन की गुप्त उड़ान (25 सितंबर 1973): हमले से ठीक 11 दिन पहले, 25 सितंबर की रात को जॉर्डन के राजा किंग हुसैन (King Hussein) अपना खुद का हेलीकॉप्टर उड़ाकर इज़रायल की एक खुफिया हवाई पट्टी पर उतरे। उन्होंने इज़रायल की प्रधानमंत्री गोल्डा मायर (Golda Meir) से गुप्त मुलाकात की और स्पष्ट रूप से चेतावनी दी कि सीरिया और मिस्र युद्ध की पूरी तैयारी कर चुके हैं और किसी भी दिन हमला कर सकते हैं। गोल्डा मायर ने इस चेतावनी को एली ज़ीरा के पास भेजा। ज़ीरा ने इसे यह कहकर टाल दिया कि “किंग हुसैन जरूरत से ज्यादा घबराए हुए हैं।”
2. एक जूनियर अधिकारी की अनसुनी पुकार (1 और 3 अक्टूबर 1973): इंटेलिजेंस में हमेशा ऊंचे पदों पर बैठे लोग सही नहीं होते। इज़रायल की दक्षिणी कमान में तैनात एक बहुत ही जूनियर खुफिया अधिकारी, लेफ्टिनेंट बिन्यामिन सिमन-तोव (Lt. Binyamin Siman-Tov) ने स्वेज नहर पर मिस्र की सेना की गतिविधियों का विश्लेषण किया। 1 अक्टूबर और फिर 3 अक्टूबर को उसने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को एक मेमो (Memo) लिखा, जिसमें उसने कहा कि मिस्र का यह जमावड़ा कोई ‘सैन्य अभ्यास’ नहीं है, बल्कि यह एक वास्तविक युद्ध की तैयारी है जिसमें नहर पार करने के उपकरण (Bridging equipment) लगाए जा रहे हैं। सिमन-तोव के उस मेमो को उसके कमांडिंग ऑफिसर ने आगे बढ़ाने से यह कहकर मना कर दिया कि यह ‘द कॉन्सेप्ट’ के खिलाफ है।
3. सोवियत संघ का अचानक पलायन (4-5 अक्टूबर 1973): 4 अक्टूबर की शाम को इज़रायली खुफिया एजेंसियों ने एक हैरान करने वाला पैटर्न पकड़ा। मिस्र और सीरिया में तैनात सोवियत संघ के सैन्य सलाहकारों के परिवारों को अचानक रातों-रात विशेष विमानों में भरकर मॉस्को वापस भेजा जा रहा था। किसी भी देश से दूतावास के परिवारों को तब निकाला जाता है, जब वहां युद्ध छिड़ने वाला हो। यह एक चमकता हुआ ‘रेड फ्लैग’ था। इज़रायल के चीफ ऑफ स्टाफ, डेविड एलाज़ार (David Elazar) चिंतित हुए, लेकिन एली ज़ीरा ने फिर से आश्वस्त किया कि युद्ध की संभावना “न्यूनतम से भी कम” (Lower than low) है।
सुपर-स्पाई का आधी रात का संदेश और कूटनीतिक दुविधा
6 अक्टूबर की सुबह, जिस दिन यहूदी धर्म का सबसे पवित्र और उपवास का दिन ‘योम किप्पुर’ (Day of Atonement) मनाया जाता है, पूरा इज़रायल खामोशी में डूबा था। रेडियो और टेलीविजन स्टेशन बंद थे। लेकिन उसी रात, 5 और 6 अक्टूबर के बीच की मध्यरात्रि में, इज़रायल की बाहरी खुफिया एजेंसी ‘मोसाद’ (Mossad) के प्रमुख ज़वी ज़मीर (Zvi Zamir) लंदन के एक सुरक्षित घर में पसीने से तर-बतर बैठे थे।
उनके सामने इज़रायल का सबसे बड़ा और सबसे गुप्त जासूस बैठा था। इसका कोडनेम ‘द एंजल’ (The Angel) था। यह व्यक्ति कोई और नहीं, बल्कि मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर का दामाद और वर्तमान राष्ट्रपति सादात का सबसे करीबी सलाहकार अशरफ मारवान (Ashraf Marwan) था।
अशरफ मारवान ने ज़वी ज़मीर की आँखों में देखकर वह भयानक वाक्य कहा: “युद्ध कल होगा, सूर्यास्त के समय।” यह खबर बिजली की तरह तेल अवीव पहुँची। 6 अक्टूबर की सुबह 8:00 बजे प्रधानमंत्री गोल्डा मायर, रक्षा मंत्री मोशे दयान और सेना प्रमुख डेविड एलाज़ार की एक आपातकालीन बैठक हुई। अब ‘द कॉन्सेप्ट’ टूट चुका था। लेकिन अब एक नई कूटनीतिक और रणनीतिक दुविधा (Neutral/Diplomatic dilemma) सामने आ खड़ी हुई।
चीफ ऑफ स्टाफ डेविड एलाज़ार ने मांग की कि इज़रायली वायुसेना (IAF) को तुरंत सीरिया और मिस्र पर ‘प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक’ (Pre-emptive Strike – पहले हमला करना) करनी चाहिए, जैसा उन्होंने 1967 में किया था। लेकिन गोल्डा मायर और मोशे दयान ने इससे इनकार कर दिया। गोल्डा मायर जानती थीं कि अगर इज़रायल ने पहली गोली चलाई, तो अमेरिका (विशेषकर अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर) उसे आक्रामक मानेगा और इज़रायल को हथियारों की आपूर्ति नहीं करेगा। शीत युद्ध के उस दौर में, बिना अमेरिकी मदद के इज़रायल का जीवित रहना असंभव था। कूटनीतिक मजबूरी के कारण, इज़रायल ने पहला वार नहीं करने का फैसला किया और अपनी रिज़र्व सेना को भी पूरी तरह से नहीं बुलाया।
दोपहर 2:00 बजे, पूरे इज़रायल में सायरन बजने लगे। योम किप्पुर की वह शांत दोपहर तोपों की गड़गड़ाहट से दहल उठी। ‘द एंजल’ के सूर्यास्त के समय के विपरीत, मिस्र और सीरिया ने दोपहर 2 बजे ही एक साथ हमला कर दिया था।
खौफनाक परिणाम और खून से लिखा गया इतिहास
अगले कुछ दिन इज़रायल के इतिहास के सबसे काले दिन थे। मिस्र के 100,000 सैनिकों ने पानी की बौछारों से बालू की दीवारें गिरा दीं और स्वेज नहर पार कर ली। सीरियाई टैंक गोलान हाइट्स को रौंदते हुए आगे बढ़ रहे थे। इज़रायल की अजेय मानी जाने वाली ‘बार-लेव लाइन’ (Bar-Lev Line) ताश के पत्तों की तरह ढह गई। मिस्र की ‘सैगर’ (Sagger) एंटी-टैंक मिसाइलों और सोवियत ‘सैम’ (SAM) एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलों ने इज़रायल के दर्जनों टैंकों और लड़ाकू विमानों को आग के गोलों में बदल दिया।
शुरुआती दिनों में, रक्षा मंत्री मोशे दयान (जो 1967 के सबसे बड़े हीरो थे) इतने टूट चुके थे कि उन्होंने कथित तौर पर ‘थर्ड टेम्पल के पतन’ (Fall of the Third Temple – इज़रायल के विनाश) की बात कह डाली थी और परमाणु हथियारों को तैयार करने का संकेत भी दिया था।
हालांकि, यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि इज़रायल ने अपनी असाधारण सैन्य क्षमता के बल पर इस युद्ध का रुख पलट दिया। भारी नुकसान सहने के बाद, इज़रायली सेना ने पलटवार किया। जनरल एरियल शेरॉन (Ariel Sharon) के नेतृत्व में इज़रायली सेना ने स्वेज नहर को पार करके मिस्र की थर्ड आर्मी को घेर लिया। उत्तर में, इज़रायली सेना सीरिया की राजधानी दमिश्क से मात्र 40 किलोमीटर दूर पहुँच गई। 25 अक्टूबर 1973 को जब संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप से युद्धविराम (Ceasefire) लागू हुआ, तब तक इज़रायल सैन्य रूप से युद्ध जीत चुका था।
लेकिन इस सैन्य जीत की मानवीय कीमत बहुत भयानक थी। यह इस युद्ध का सबसे बड़ा और दुखद नकारात्मक पहलू था। महज़ 19 दिनों के इस युद्ध में इज़रायल के 2,656 सैनिक मारे गए और 7,000 से अधिक घायल हुए। एक छोटे से देश के लिए यह एक ऐसा आघात था जिसने उसके पूरे समाज को मानसिक रूप से झकझोर कर रख दिया। जनता में हाहाकार मच गया और ‘द कॉन्सेप्ट’ के रचनाकारों को कठघरे में खड़ा करने की मांग उठी।
अग्रनाट आयोग (Agranat Commission) और ‘डेविल्स एडवोकेट’ का उदय
नवंबर 1973 में, इज़रायल सरकार ने इस खुफिया विफलता की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शिमोन अग्रनाट की अध्यक्षता में ‘अग्रनाट आयोग’ (Agranat Commission) का गठन किया।
आयोग की रिपोर्ट ‘ग्रुपथिंक’ की मानसिकता पर एक करारा तमाचा थी। रिपोर्ट में सैन्य खुफिया प्रमुख मेजर जनरल एली ज़ीरा को इस पूरी आपदा के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया गया, क्योंकि उन्होंने उन सभी सूचनाओं को दबा दिया था जो ‘द कॉन्सेप्ट’ के खिलाफ जाती थीं। सेना प्रमुख डेविड एलाज़ार को भी इस्तीफा देना पड़ा। भारी जन-दबाव के कारण, युद्ध के कुछ महीनों बाद ही प्रधानमंत्री गोल्डा मायर को भी अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। मोशे दयान की ‘अजेय नायक’ की छवि हमेशा के लिए धूमिल हो गई।
लेकिन हर गहरी विफलता अपने भीतर एक महान सुधार का बीज भी लेकर आती है। और यहीं से इस घटना के दीर्घकालिक और सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं। अग्रनाट आयोग की सिफारिशों के बाद, इज़रायली खुफिया तंत्र (विशेषकर ‘अमन’) में एक आमूल-चूल बदलाव किया गया।
सबसे बड़ा ढांचागत बदलाव था ‘इप्खा मिस्तब्रा’ (Ipkha Mistabra) नामक एक विशेष विभाग का गठन। इसे अरामी भाषा में “द ऑपोजिट इज ट्रू” (विपरीत भी सच हो सकता है) या अंग्रेजी में ‘रेड टीम’ (Red Team / Devil’s Advocate) कहा जाता है। इस लाल टीम का एकमात्र काम मुख्य खुफिया एजेंसी के निष्कर्षों को चुनौती देना और उनका खंडन करना है। अगर पूरा खुफिया विभाग कहता है कि “युद्ध नहीं होगा”, तो यह लाल टीम का कर्तव्य है कि वह एक ऐसी रिपोर्ट बनाए जो यह साबित करे कि “युद्ध क्यों होगा”। इस लाल टीम के प्रमुख को सेना के सबसे शीर्ष अधिकारियों के सामने सीधे अपनी बात रखने का अधिकार दिया गया, बिना किसी सेंसरशिप के। आज भी, दुनिया भर की खुफिया और कॉर्पोरेट एजेंसियां निर्णय लेने में ‘ग्रुपथिंक’ से बचने के लिए इसी ‘रेड टीम’ मॉडल का इस्तेमाल करती हैं।
कूटनीतिक मोर्चे पर भी, इस युद्ध ने एक बहुत बड़ा ‘पॉजिटिव’ (सकारात्मक) बदलाव किया। इस युद्ध ने मिस्र के अनवर सादात को उनका खोया हुआ अरब सम्मान वापस दिला दिया, और इज़रायल को यह समझा दिया कि वह हमेशा के लिए युद्ध के दम पर जीवित नहीं रह सकता। इसी युद्ध के मनोवैज्ञानिक झटके ने शांति वार्ता के रास्ते खोले, जिसके परिणामस्वरूप 1978 का ऐतिहासिक ‘कैंप डेविड समझौता’ (Camp David Accords) हुआ और 1979 में मिस्र और इज़रायल के बीच एक पूर्ण शांति संधि (Peace Treaty) पर हस्ताक्षर हुए। आज भी इज़रायल और मिस्र के बीच वह शांति कायम है।
छात्रों के लिए अंतिम निष्कर्ष: अज्ञानता नहीं, बल्कि ‘अहंकार’ है सबसे बड़ा दुश्मन
योम किप्पुर युद्ध की खुफिया विफलता हमें एक बहुत गहरा सबक सिखाती है। इतिहास के अध्येता, रक्षा विशेषज्ञ या यहां तक कि एक कॉर्पोरेट लीडर के रूप में हमें यह याद रखना चाहिए कि जानकारी (Data) का होना ही काफी नहीं है; उस जानकारी को बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वीकार करने का साहस होना ज्यादा जरूरी है।
1973 में इज़रायल के पास मिस्र और सीरिया के बारे में दुनिया की सबसे बेहतरीन जानकारी थी। उनके पास जासूस थे, तस्वीरें थीं, और तारीखें थीं। लेकिन उनके पास वह विनम्रता नहीं थी जो उस जानकारी को सही रूप में पढ़ने के लिए आवश्यक थी। ‘द कॉन्सेप्ट’ ने उनकी आँखों पर अहंकार की ऐसी पट्टी बांध दी थी, जिसे केवल 2,656 सैनिकों के खून ने खोला। यह कहानी साबित करती है कि जब हम अपने ही बनाए गए ‘सिद्धांतों’ से प्यार करने लगते हैं और सच बोलने वालों को दबाने लगते हैं, तो आपदा केवल एक समय की बात रह जाती है।