प्रोजेक्ट वेनोना: जब गणित और ‘सिग्नल्स’ ने खोला अमेरिका के अंदर छिपे ‘परमाणु जासूसों’ का सबसे खौफनाक राज़!

by V iS iO iN 2 min read

(The Venona Project: Decrypting Soviet Cables to Find Atomic Spies in the United States)

कल्पना कीजिए कि साल 1945 है। अमेरिका ने अभी-अभी जापान पर दुनिया का पहला परमाणु बम (Atomic Bomb) गिराया है। वाशिंगटन में बैठे राजनेताओं और जनरलों को एक गहरा अहंकार है। उन्हें लगता है कि परमाणु बम बनाने का विज्ञान इतना जटिल और रहस्यमयी है कि सोवियत संघ (रूस) को इस तकनीक तक पहुँचने में कम से कम 10 से 15 साल लगेंगे। अमेरिका को यकीन था कि दुनिया पर उनका ‘परमाणु एकाधिकार’ (Nuclear Monopoly) सुरक्षित है। लेकिन ठीक चार साल बाद, 29 अगस्त 1949 को कज़ाकिस्तान के रेगिस्तान में एक भयंकर धमाका होता है। सोवियत संघ ने अपना पहला परमाणु बम (RDS-1) सफलतापूर्वक टेस्ट कर लिया था। जब अमेरिकी खुफिया एजेंसियों (CIA) ने उस धमाके के ‘रेडियोएक्टिव डस्ट’ (Radioactive dust) का विश्लेषण किया, तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह बम अमेरिकी बम की बिल्कुल ‘कार्बन कॉपी’ था।

यह कोई वैज्ञानिक चमत्कार नहीं था; यह इतिहास की सबसे बड़ी ‘औद्योगिक जासूसी’ (Industrial Espionage) थी। सोवियत संघ ने अमेरिका के अति-गुप्त ‘मैनहट्टन प्रोजेक्ट’ (Manhattan Project) के अंदर अपने जासूस घुसा रखे थे, जिन्होंने बम का पूरा ब्लूप्रिंट चुराकर स्टालिन को सौंप दिया था। अमेरिका के अंदर हाहाकार मच गया। सबसे बड़ा सवाल यह था कि— हमारे सबसे सुरक्षित लैब के अंदर दुश्मन के जासूस कौन हैं, और उन्हें कैसे पकड़ा जाए?

इस सवाल का जवाब किसी ज़मीनी जासूस (HUMINT) ने नहीं, बल्कि तारों, गणित और सिग्नल्स के एक ऐसे महाकाव्य ने दिया जिसे जासूसी के इतिहास में ‘प्रोजेक्ट वेनोना’ (Project Venona) के नाम से जाना जाता है।

इंटेलिजेंस और रक्षा अध्ययन के छात्रों के लिए, ‘प्रोजेक्ट वेनोना’ केवल एक कोड-ब्रेकिंग ऑपरेशन नहीं है। यह सिग्नल इंटेलिजेंस (SIGINT) की वह अकल्पनीय मास्टरक्लास है जिसने साबित किया कि गणित और सांख्यिकी (Statistics) दुनिया के सबसे बड़े जासूसों की गर्दन पकड़ सकते हैं। आइए, एक विश्लेषणात्मक प्रवाह में इस अति-गुप्त मिशन का चीरहरण करते हैं।

इस कहानी की शुरुआत 1943 में होती है, जब अमेरिका और सोवियत संघ द्वितीय विश्व युद्ध में सहयोगी (Allies) थे। लेकिन अमेरिकी सेना के सिग्नल इंटेलिजेंस सर्विस (SIS) को सोवियत संघ के इरादों पर शक था। उन्होंने सोवियत दूतावासों (वाशिंगटन और न्यूयॉर्क) से मॉस्को भेजे जा रहे कूटनीतिक केबल्स (टेलीग्राम) को गुपचुप तरीके से रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया।

यहाँ एक बहुत बड़ी तकनीकी बाधा थी। सोवियत संघ अपने संदेशों को एन्क्रिप्ट (Encrypt) करने के लिए ‘वन-टाइम पैड’ (One-Time Pad) तकनीक का इस्तेमाल करता था। खुफिया विज्ञान (Cryptography) में, ‘वन-टाइम पैड’ दुनिया का इकलौता ऐसा कोड है जिसे तोड़ना गणितीय रूप से ‘असंभव’ (Mathematically Unbreakable) माना जाता है। इसमें संदेश को एक ऐसे रैंडम (Random) नंबरों के पेज से लॉक किया जाता है, जिसकी केवल दो ही कॉपियां होती हैं—एक भेजने वाले के पास और एक पाने वाले के पास। एक बार संदेश भेजने के बाद उस पेज को नष्ट कर दिया जाता है। चूंकि कोड में कोई ‘पैटर्न’ (Pattern) नहीं होता, इसलिए कोई भी सुपरकंप्यूटर उसे क्रैक नहीं कर सकता।

लेकिन, इंटेलिजेंस की दुनिया का एक सुनहरा नियम है: “सिस्टम कभी फेल नहीं होता, इंसान फेल होता है” (Humans are the weakest link)।

1941 के अंत में, जब जर्मन सेना (नाज़ी) मॉस्को की तरफ बढ़ रही थी, तो सोवियत संघ के कोड बनाने वाले कारखानों पर बहुत भारी दबाव आ गया। उन्हें रातों-रात हज़ारों ‘वन-टाइम पैड’ छापने थे। इसी जल्दबाज़ी और घबराहट में, सोवियत कर्मचारियों ने एक भयानक ‘ऑपरेशनल भूल’ (OPSEC Failure) कर दी। उन्होंने आलस में आकर एक ही रैंडम पैड की 35,000 से अधिक ‘डुप्लीकेट’ (Duplicate) कॉपियां छाप दीं और उन्हें अलग-अलग दूतावासों में भेज दिया। यानी जो चाबी केवल ‘एक बार’ इस्तेमाल होनी थी, वह ‘दो बार’ इस्तेमाल होने लगी!

अमेरिकी क्रिप्टोग्राफर मेरेडिथ गार्डनर (Meredith Gardner) और रिचर्ड फ्रीडमैन ने जब इन केबल्स का सांख्यिकीय विश्लेषण (Statistical Analysis) किया, तो उन्होंने 1946 में इस ‘पैटर्न’ को पकड़ लिया। जैसे ही ‘वन-टाइम पैड’ का दोबारा इस्तेमाल पकड़ा गया, वह ‘अनब्रेकेबल कोड’ ताश के पत्तों की तरह ढह गया।

जब अमेरिका ने इन सोवियत तारों (Cables) को पढ़ना शुरू किया, तो ‘वेनोना’ के डिक्रिप्ट्स ने जो सच उगला, वह डरावना था। संदेशों से पता चला कि अमेरिकी सरकार के हर एक महत्वपूर्ण विभाग—विदेश मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, ओएसएस (OSS – जो बाद में CIA बनी), और सबसे खतरनाक, ‘मैनहट्टन प्रोजेक्ट’ (परमाणु बम कार्यक्रम)—में सोवियत जासूस काम कर रहे थे।

इन डिकोड किए गए संदेशों में असली नाम नहीं थे, बल्कि ‘कवर नेम’ (Code names) थे। उदाहरण के लिए, एक जासूस का कोडनेम ‘REST’ था, दूसरे का ‘LIBERAL’ और एक का ‘HOMER’। अमेरिकी काउंटर-इंटेलिजेंस (FBI) ने इन कोडनेम्स को असली लोगों से जोड़ने (Cross-referencing) का काम शुरू किया।

सबसे बड़ी सफलता 1949 में मिली जब ‘वेनोना’ के एक संदेश ने सीधे तौर पर क्लॉस फुक्स (Klaus Fuchs) की तरफ इशारा किया। फुक्स एक ब्रिटिश-जर्मन भौतिक विज्ञानी था जो लॉस एलामोस (Los Alamos) में परमाणु बम के बिल्कुल मुख्य हिस्से (Core) पर काम कर रहा था। पूछताछ में फुक्स टूट गया और उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया। फुक्स की गिरफ्तारी के बाद कड़ियों (Dots) को जोड़ा गया, जो ‘डेविड ग्रीनग्लास’ (David Greenglass) से होते हुए जूलियस और एथेल रोसेनबर्ग (Julius and Ethel Rosenberg) तक पहुँचीं। रोसेनबर्ग दंपत्ति सोवियत संघ के लिए अमेरिका के अंदर एक पूरा ‘जासूसी नेटवर्क’ (Spy Ring) चला रहे थे, जिसने रडार, सोनार और परमाणु बम के डिज़ाइन रूस को बेचे थे।

लेकिन ‘प्रोजेक्ट वेनोना’ ने अमेरिकी खुफिया तंत्र के सामने इतिहास की सबसे क्रूर और जटिल रणनीतिक दुविधा खड़ी कर दी। एक विश्लेषक के तौर पर, यह इस केस स्टडी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है:


खुफिया तंत्र की सबसे बड़ी दुविधा (The Core Strategic Dilemmas)

  • न्याय बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा (Law Enforcement vs. Intelligence Protection): FBI को अदालत में रोसेनबर्ग दंपत्ति को फांसी की सजा दिलवाने के लिए सबूत चाहिए थे। सबसे पक्के सबूत ‘वेनोना’ के डिकोड किए गए तार (Cables) थे। लेकिन अगर सरकार अदालत में उन केबल्स को पेश कर देती, तो सोवियत संघ (KGB) को तुरंत पता चल जाता कि अमेरिका उनका कोड पढ़ रहा है, और वे रातों-रात अपना कोड बदल देते। सीआईए और सेना ने साफ कह दिया कि “हम कुछ जासूसों को पकड़ने के लिए अपनी सबसे बड़ी ‘सिग्नल इंटेलिजेंस’ (SIGINT) की खदान को कुर्बान नहीं कर सकते।” इस कारण कई जासूसों को सबूत होते हुए भी आज़ाद छोड़ना पड़ा, या उन्हें पकड़ने के लिए ‘फर्जी सुराग’ (Parallel Construction) गढ़ने पड़े।

  • गोपनीयता का अतिरेक (The Danger of Extreme Secrecy): वेनोना प्रोजेक्ट इतना अति-गुप्त (Top Secret) था कि कई सालों तक अमेरिका के राष्ट्रपति (हैरी ट्रूमैन) और सीआईए (CIA) को भी इसके बारे में पूरी जानकारी नहीं दी गई थी! केवल सेना के कुछ गिने-चुने अधिकारी और FBI के डायरेक्टर जे. एडगर हूवर को ही इसका पूरा एक्सेस था। इस ‘साइलो इफ़ेक्ट’ (Silo Effect) के कारण अमेरिकी सरकार के अंदर भारी अविश्वास पैदा हो गया और ‘मैकार्थीवाद’ (McCarthyism) का जन्म हुआ, जहाँ बिना सबूत के हज़ारों निर्दोष अमेरिकियों पर ‘कम्युनिस्ट’ होने का शक किया जाने लगा।

  • डबल क्रॉस (The Inside Betrayal): जिस तरह ‘बर्लिन टनल’ (ऑपरेशन गोल्ड) की खबर KGB को पहले से थी, उसी तरह वेनोना का राज़ भी सुरक्षित नहीं था। जिस ‘कैम्ब्रिज फाइव’ (The Cambridge Five) के बारे में हमने पिछले अंक में पढ़ा था, उसका मुकुटमणि ‘किम फिलबी’ वाशिंगटन में वेनोना प्रोजेक्ट का ही संपर्क अधिकारी था! फिलबी ने सोवियत संघ को बता दिया था कि अमेरिका उनका कोड तोड़ रहा है। हालांकि सोवियत संघ ने अपने कोड बदल दिए, लेकिन वे 1940 के दशक में भेजे गए पुराने संदेशों को हवा से वापस नहीं ले सकते थे, और अमेरिका उन्हीं पुराने संदेशों को डिकोड करके जासूसों को पकड़ता रहा।


जासूसी और थिंकटैंक का अध्ययन करने वाले छात्रों के लिए ‘प्रोजेक्ट वेनोना’ केवल एक ऐतिहासिक जीत नहीं है, बल्कि यह ‘ऑपरेशंस सिक्योरिटी’ (OPSEC) का सबसे कड़वा सबक है। सोवियत संघ की कोड बनाने वाली फैक्ट्री के एक अज्ञात क्लर्क की ‘आलस’ (एक ही पैड को दो बार छापना) ने उनके देश के सबसे बड़े जासूसी नेटवर्क को तबाह कर दिया।

यह केस स्टडी यह भी स्थापित करती है कि एक आधुनिक खुफिया एजेंसी (Intelligence Agency) को अक्सर ‘जासूस को जेल भेजने’ और ‘भविष्य के लिए खुफिया स्रोत को बचाए रखने’ के बीच चुनाव करना पड़ता है। रोसेनबर्ग दंपत्ति को 1953 में ‘इलेक्ट्रिक चेयर’ (Electric Chair) पर मौत की सजा दे दी गई, लेकिन ‘प्रोजेक्ट वेनोना’ का रहस्य इतना गहरा था कि इसे 1995 तक (शीत युद्ध खत्म होने के कई सालों बाद तक) अमेरिकी सरकार ने दुनिया से छिपा कर रखा।

जब 1995 में अंततः वेनोना के दस्तावेज़ों (Declassified documents) को सार्वजनिक किया गया, तो पूरी दुनिया को पता चला कि जो लोग दशकों तक रोसेनबर्ग और फुक्स को ‘निर्दोष’ मानते थे, वे गलत थे। सिग्नल्स और गणित ने 50 साल पहले ही साबित कर दिया था कि वे पश्चिमी दुनिया के सबसे घातक गद्दार थे।

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