ऑपरेशन कैम्ब्रिज: जब ब्रिटेन के ‘सबसे वफादार’ अफसरों ने ही सोवियत संघ को बेच दिए पश्चिमी दुनिया के सबसे गहरे राज़!

by V iS iO iN 2 min read

कल्पना कीजिए कि आप दुनिया की सबसे बेहतरीन और खूंखार मानी जाने वाली खुफिया एजेंसी (MI6) के महानिदेशक हैं। शीत युद्ध अपने चरम पर है, और आपको यह सुनिश्चित करना है कि सोवियत संघ का कोई भी जासूस आपके देश की सीमाओं या आपके सरकारी तंत्र के अंदर न घुस पाए। इस असंभव से लगने वाले काम को अंजाम देने के लिए, आप अपनी एजेंसी के अंदर एक अति-गुप्त ‘एंटी-सोवियत काउंटर-इंटेलिजेंस’ (Anti-Soviet Counter-Intelligence) विभाग बनाते हैं। आप इस विभाग का मुखिया अपने सबसे होनहार, कुलीन, और भरोसेमंद अफसर को बनाते हैं, जिसे आप भविष्य का ‘MI6 चीफ’ भी मानते हैं। लेकिन कुछ वर्षों बाद, आपको पता चलता है कि जिस व्यक्ति को आपने रूसी जासूसों को पकड़ने की जिम्मेदारी दी थी… वह स्वयं पिछले बीस वर्षों से सोवियत संघ (KGB) का सबसे बड़ा, सबसे वफादार और सबसे घातक जासूस था। यह कोई जासूसी उपन्यास का प्लॉट नहीं है, बल्कि यह 20वीं सदी के खुफिया इतिहास का वह काला अध्याय है जिसे पूरी दुनिया ‘द कैम्ब्रिज फाइव’ (The Cambridge Five) के नाम से जानती है। हेरोल्ड एड्रियन रसेल “किम” फिलबी, डोनाल्ड मैक्लीन, गाए बर्गेस, एंथनी ब्लंट, और जॉन केर्नक्रॉस—ये वे पांच नाम हैं जिन्होंने ब्रिटेन के एमआई-5, एमआई-6, विदेश मंत्रालय और युद्ध कार्यालय के सर्वोच्च पदों पर बैठकर पश्चिमी दुनिया के सबसे गहरे और संवेदनशील राज़ सीधे मॉस्को की झोली में डाल दिए।

इस महाकाव्य की शुरुआत समझने के लिए हमें 1930 के दशक के यूरोप की सामाजिक और राजनीतिक वास्तुकला (Socio-political architecture) का विश्लेषण करना होगा। खुफिया विज्ञान (Intelligence Science) में एक स्थापित सिद्धांत है जिसे ‘MICE’ (Money, Ideology, Coercion, Ego) कहा जाता है। दुनिया के 90 प्रतिशत जासूस पैसे के लालच में, ब्लैकमेल (Coercion) के डर से, या अपने अहंकार (Ego) की संतुष्टि के लिए अपने देश से गद्दारी करते हैं। लेकिन ‘कैम्ब्रिज फाइव’ का मामला पूरी तरह से ‘I’ यानी विचारधारा (Ideology) पर आधारित था। 1930 के दशक की शुरुआत में, पूरी दुनिया ‘महामंदी’ (The Great Depression) की मार झेल रही थी। अमेरिका और ब्रिटेन में बेरोजगारी चरम पर थी, पूंजीवाद (Capitalism) पूरी तरह से विफल होता हुआ दिखाई दे रहा था, और पूरे यूरोप में एडोल्फ हिटलर और मुसोलिनी के फासीवाद (Fascism) का काला साया तेजी से फैल रहा था। इसी दौर में, ब्रिटेन की सबसे एलीट और प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी (Cambridge University) के ट्रिनिटी कॉलेज में पढ़ने वाले कुछ बेहद अमीर, कुलीन और तीक्ष्ण बुद्धि वाले छात्रों को यह लगने लगा था कि पश्चिमी लोकतंत्र इस फासीवाद को हराने में सक्षम नहीं है। उनके युवा और आदर्शवादी दिमागों में यह बात घर कर गई थी कि केवल सोवियत संघ का ‘साम्यवाद’ (Communism) और जोसेफ स्टालिन की लाल सेना ही दुनिया को हिटलर के चंगुल से बचा सकती है।

सोवियत संघ की खुफिया एजेंसी, जिसे उस समय NKVD (बाद में KGB) कहा जाता था, ब्रिटेन की इस नब्ज को बहुत अच्छी तरह समझ रही थी। 1934 में, अर्नोल्ड ड्यूश (Arnold Deutsch) नाम का एक असाधारण सोवियत ‘इलीगल’ (Illegal—वह जासूस जो बिना किसी कूटनीतिक सुरक्षा के दुश्मन देश में रहता है) लंदन पहुँचा। ड्यूश एक शानदार मनोवैज्ञानिक और रणनीतिकार था। उसने कैम्ब्रिज के उन छात्रों को निशाना बनाया जो वामपंथी विचारधारा की ओर झुकाव रखते थे, लेकिन जो खुले तौर पर कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य नहीं थे। ड्यूश का सिद्धांत बहुत स्पष्ट था: “हमें सड़कों पर नारा लगाने वाले कम्युनिस्ट नहीं चाहिए; हमें ऐसे युवा चाहिए जो अपने साम्यवादी विचारों को छुपा सकें, सूट-बूट पहनें, ब्रिटिश प्रतिष्ठान (Establishment) का हिस्सा बनें, और धीरे-धीरे सत्ता के सर्वोच्च शिखरों तक पहुँचें।” ड्यूश ने सबसे पहले किम फिलबी (Kim Philby) को भर्ती किया, जिसे सोवियत कोडनेम ‘स्टेनली’ (Stanley) दिया गया। फिलबी के माध्यम से ड्यूश ने डोनाल्ड मैक्लीन (कोडनेम: होमर), गाए बर्गेस (कोडनेम: हिक्स), एंथनी ब्लंट (कोडनेम: जॉनसन), और जॉन केर्नक्रॉस (कोडनेम: लिस्ज़ट) को सोवियत जासूसी नेटवर्क का हिस्सा बना लिया। ड्यूश ने इन पांचों को सख्त निर्देश दिए कि वे तुरंत अपने सभी कम्युनिस्ट दोस्तों से नाता तोड़ लें, वामपंथी साहित्य पढ़ना बंद कर दें, और दुनिया की नजरों में कट्टर दक्षिणपंथी और ब्रिटिश साम्राज्य के वफादार बन जाएं। इसे खुफिया भाषा में ‘डीप कवर’ (Deep Cover) स्थापित करना कहा जाता है।

एक विश्लेषक के तौर पर सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि सोवियत संघ के प्रति वफादार ये पांच युवा, ब्रिटेन के सबसे सुरक्षित और संवेदनशील खुफिया तंत्र (MI5 और MI6) के अंदर घुसने में कैसे सफल हो गए? यहीं पर ब्रिटिश इंटेलिजेंस की सबसे बड़ी संरचनात्मक और मनोवैज्ञानिक विफलता (Structural and Psychological Failure) सामने आती है, जिसे आज ‘द ओल्ड बॉय नेटवर्क’ (The Old Boy Network) या ‘क्लास बायस’ (Class Bias) कहा जाता है। 1930 और 1940 के दशक के ब्रिटेन में, खुफिया एजेंसियों में नौकरी पाने के लिए आज की तरह कोई ‘पॉजिटिव वेटिंग’ (Positive Vetting) प्रक्रिया, बैकग्राउंड चेक, या पॉलीग्राफ (लाई-डिटेक्टर) टेस्ट नहीं होता था। एमआई-6 में भर्ती होने का तरीका किसी जेंटलमैन क्लब में शामिल होने जैसा था। भर्ती करने वाले अधिकारी केवल यह देखते थे कि उम्मीदवार किस खानदान से है, उसने किस पब्लिक स्कूल (जैसे ईटन या हैरो) से पढ़ाई की है, क्या वह कैम्ब्रिज या ऑक्सफोर्ड का छात्र है, और क्या वह क्लब में अच्छी तरह से शराब पीकर शानदार अंग्रेजी बोल सकता है। ब्रिटिश प्रतिष्ठान का यह एक अंधा ‘संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह’ (Cognitive Bias) था कि देशद्रोह या गद्दारी केवल गरीब, मजदूर वर्ग या विदेशी लोग ही कर सकते हैं; कैम्ब्रिज से पढ़ा हुआ एक अमीर ब्रिटिश ‘जेंटलमैन’ कभी गद्दार नहीं हो सकता। इसी ‘मिरर इमेजिंग’ (Mirror Imaging) के धोखे का फायदा उठाकर, इन पांचों ने बिना किसी शक के ब्रिटिश सरकार की सबसे गहरी परतों में प्रवेश कर लिया।

जैसे ही द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) शुरू हुआ, इन पांचों गद्दारों की असली कीमत सोवियत संघ को मिलने लगी। जॉन केर्नक्रॉस (John Cairncross) को ब्रिटेन के अति-गुप्त कोड-ब्रेकिंग सेंटर ‘ब्लेचले पार्क’ (Bletchley Park) में तैनात किया गया। यह वही जगह थी जहाँ एलन ट्यूरिंग जैसे गणितज्ञों ने नाजी जर्मनी की ‘एनिग्मा’ (Enigma) मशीन का कोड तोड़ा था। केर्नक्रॉस ने एनिग्मा से मिलने वाले कच्चे डिक्रिप्ट्स (Raw Decrypts), जिन्हें ‘अल्ट्रा’ (Ultra) कहा जाता था, सीधे अपने सोवियत हैंडलर्स को सौंपना शुरू कर दिया। 1943 में हुए ‘कुर्स्क के युद्ध’ (Battle of Kursk), जो इतिहास का सबसे बड़ा टैंक युद्ध था, में सोवियत संघ की जीत का एक बहुत बड़ा श्रेय केर्नक्रॉस द्वारा दी गई ‘सिग्नल इंटेलिजेंस’ (SIGINT) को जाता है, क्योंकि उसने जर्मन वायुसेना (Luftwaffe) की पूरी युद्ध योजना स्टालिन की मेज पर रख दी थी। दूसरी ओर, एंथनी ब्लंट एमआई-5 (ब्रिटेन की घरेलू खुफिया एजेंसी) का एक वरिष्ठ अधिकारी बन गया। ब्लंट ने एमआई-5 द्वारा निगरानी रखे जा रहे सोवियत जासूसों की सूची मॉस्को को सौंप दी, जिससे कई सोवियत एजेंट ब्रिटिश पुलिस की पकड़ में आने से बच गए। ब्लंट की पहुँच इतनी गहरी थी कि उसे ब्रिटिश शाही परिवार (Royal Family) का कला सलाहकार (Art Advisor) भी नियुक्त किया गया था।

लेकिन इस पूरे जासूसी नेटवर्क का मुकुटमणि (Crown Jewel) किम फिलबी (Kim Philby) था। फिलबी का उदय एमआई-6 के अंदर किसी रॉकेट की तरह हुआ। वह इतना चतुर और पेशेवर था कि उसके वरिष्ठ अधिकारी उसे आँख मूंदकर मानते थे। 1944 में, जब शीत युद्ध की आहटें सुनाई देने लगी थीं, एमआई-6 ने ‘सेक्शन IX’ (Section IX) नामक एक नया विभाग बनाया, जिसका एकमात्र काम सोवियत संघ की जासूसी करना और ब्रिटेन के अंदर मौजूद सोवियत जासूसों को पकड़ना था। फिलबी ने राजनीतिक चालें चलकर खुद को इस विभाग का प्रमुख (Head of Section IX) नियुक्त करवा लिया। यह जासूसी के इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना थी—ब्रिटेन का मुख्य सोवियत-विरोधी अधिकारी ही सोवियत संघ का सबसे बड़ा जासूस था! इस पद पर रहते हुए फिलबी ने पश्चिमी खुफिया एजेंसियों को अपूरणीय क्षति पहुंचाई। इसका सबसे खौफनाक उदाहरण अगस्त 1945 का ‘कॉन्स्टेंटिन वोल्कोव मामला’ (The Konstantin Volkov Incident) है। वोल्कोव इस्तांबुल (तुर्की) में तैनात एक वरिष्ठ केजीबी अधिकारी था, जिसने ब्रिटिश दूतावास से संपर्क करके दलबदल (Defection) की पेशकश की। वोल्कोव ने कहा कि इसके बदले में वह एमआई-6 और ब्रिटिश विदेश मंत्रालय में बैठे तीन बड़े सोवियत जासूसों के नाम बताएगा। यह फाइल सीधी लंदन में किम फिलबी की मेज पर आई। फिलबी को तुरंत समझ आ गया कि वोल्कोव उसी (फिलबी) और उसके साथियों की बात कर रहा है। फिलबी ने चालाकी से लंदन से इस्तांबुल जाने में जानबूझकर देरी की, और इस बीच उसने मॉस्को को एक आपातकालीन संदेश भेज दिया। जब तक फिलबी इस्तांबुल पहुँचता, केजीबी के गुंडों ने वोल्कोव को पकड़ लिया था, उसे नशीली दवाएं दीं और उसे एक स्ट्रेचर पर बांधकर वापस मॉस्को ले गए, जहाँ पूछताछ के बाद उसे गोली मार दी गई। फिलबी ने अपनी जान बचाने के लिए एक इंसान को मौत के घाट उतार दिया था, और एमआई-6 को कभी शक नहीं हुआ।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, जब दुनिया ‘शीत युद्ध’ (Cold War) और परमाणु हथियारों की होड़ में प्रवेश कर रही थी, तब इस नेटवर्क का एक और सदस्य, डोनाल्ड मैक्लीन (Donald Maclean), वाशिंगटन स्थित ब्रिटिश दूतावास में प्रथम सचिव (First Secretary) के पद पर तैनात था। मैक्लीन की पहुँच अमेरिका और ब्रिटेन के बीच होने वाले अति-गुप्त पत्राचार तक थी। मैक्लीन ने अमेरिका के परमाणु हथियार कार्यक्रम (Manhattan Project), यूरेनियम उत्पादन के आंकड़ों, और ‘नाटो’ (NATO) की स्थापना से जुड़े हजारों दस्तावेज मॉस्को को लीक कर दिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि 1948 में मैक्लीन ने स्टालिन को यह बता दिया था कि अमेरिका के पास उस समय कितने परमाणु बम मौजूद थे और उनकी उत्पादन क्षमता क्या थी। इस सामरिक खुफिया जानकारी (Strategic Intelligence) ने स्टालिन को अमेरिका के साथ कूटनीतिक सौदेबाजी करने और ‘बर्लिन नाकाबंदी’ (Berlin Blockade) के दौरान बिना डरे आक्रामक रुख अपनाने का आत्मविश्वास दिया, क्योंकि उसे पता था कि अमेरिका की परमाणु क्षमता उस समय कागजी दावों से बहुत कम थी। गाए बर्गेस (Guy Burgess), जो अपने शराबी और अराजक स्वभाव के बावजूद अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण ब्रिटिश विदेश मंत्रालय में टिका हुआ था, मैक्लीन की मदद करता रहा और उसने भी हजारों गोपनीय दस्तावेज सोवियत दूतावास पहुंचाए।

इस अभेद्य जासूसी किले में पहली दरार किसी इंसानी मुखबिर (HUMINT) से नहीं, बल्कि अमेरिका के एक अति-गुप्त सिग्नल इंटेलिजेंस (SIGINT) कार्यक्रम से पड़ी, जिसे ‘प्रोजेक्ट वेनोना’ (Project Venona) कहा जाता था। 1940 के दशक के मध्य में, अमेरिकी और ब्रिटिश क्रिप्टोग्राफर्स ने सोवियत संघ के कूटनीतिक केबल्स को डिकोड करना शुरू कर दिया था। 1949 आते-आते, वेनोना के डिक्रिप्टेड संदेशों से यह स्पष्ट हो गया कि वाशिंगटन के ब्रिटिश दूतावास में 1944 से 1948 के बीच ‘होमर’ (Homer) कोडनेम वाला एक बहुत बड़ा सोवियत जासूस काम कर रहा था। जैसे-जैसे एमआई-5 और एफबीआई (FBI) ने वेनोना के सुरागों को जोड़ना शुरू किया (मोज़ेक थ्योरी का उपयोग करते हुए), फंदा डोनाल्ड मैक्लीन के गले की ओर कसने लगा। लेकिन यहाँ फिर से किम फिलबी का साया बीच में आ गया। 1949 में फिलबी को वाशिंगटन में ब्रिटिश खुफिया संपर्क अधिकारी (British Intelligence Liaison Officer) बनाकर भेजा गया था, जहाँ उसका काम सीआईए (CIA) और एफबीआई के साथ वेनोना प्रोजेक्ट पर काम करना था। फिलबी को तुरंत पता चल गया कि अमेरिका और ब्रिटेन ‘होमर’ (मैक्लीन) के बहुत करीब पहुँच चुके हैं।

फिलबी जानता था कि अगर मैक्लीन पकड़ा गया, तो पूछताछ में वह फिलबी और अन्य साथियों का नाम भी उगल देगा। फिलबी ने गाए बर्गेस को, जो उस समय वाशिंगटन में ही था, जानबूझकर कुछ ऐसी हरकतें करने को कहा जिससे बर्गेस को वापस लंदन भेज दिया जाए। बर्गेस लंदन पहुँचा और उसने मैक्लीन को चेतावनी दी कि एमआई-5 उसे गिरफ्तार करने वाली है। 25 मई 1951 की रात को, जब एमआई-5 सोमवार को मैक्लीन से पूछताछ करने की योजना बना रही थी, बर्गेस और मैक्लीन दोनों रातों-रात लंदन से गायब हो गए। वे फ्रांस से होते हुए एक नाव के जरिए ‘आयरन कर्टेन’ (Iron Curtain) के पार सोवियत संघ पहुँच गए। इन दोनों शीर्ष ब्रिटिश राजनयिकों के अचानक गायब होने और रूस भाग जाने की खबर ने पूरी पश्चिमी दुनिया में भूचाल ला दिया। वाशिंगटन में सीआईए और एफबीआई आगबबूला हो गए। उन्हें समझ आ गया कि बर्गेस और मैक्लीन को किसी ने अंदर से ‘टिप-ऑफ’ (Tip-off) दिया था। अमेरिकी खुफिया प्रमुखों का शक सीधा किम फिलबी पर गया, क्योंकि बर्गेस वाशिंगटन में फिलबी के ही घर में रह रहा था। सीआईए के तत्कालीन प्रमुख जनरल वाल्टर बेडेल स्मिथ और काउंटर-इंटेलिजेंस चीफ जेम्स जीसस एंग्लटन (James Jesus Angleton) ने एमआई-6 से साफ कह दिया कि फिलबी एक सोवियत जासूस है और अगर उसे नहीं हटाया गया तो अमेरिका ब्रिटेन के साथ सभी खुफिया संबंध तोड़ देगा।

फिलबी को वापस लंदन बुलाकर एमआई-5 ने उससे कड़ी पूछताछ की। लेकिन एमआई-5 के पास फिलबी के खिलाफ कोई ठोस अदालती सबूत नहीं था। फिलबी ने अपनी ‘डीप कवर’ ट्रेनिंग का इस्तेमाल करते हुए एक शांत और चतुर जेंटलमैन की तरह सभी आरोपों को खारिज कर दिया। ब्रिटिश प्रतिष्ठान के ‘ओल्ड बॉय नेटवर्क’ ने एक बार फिर फिलबी को बचाया। 1955 में, तत्कालीन ब्रिटिश विदेश सचिव हेरोल्ड मैकमिलन (Harold Macmillan) ने संसद में खड़े होकर आधिकारिक रूप से फिलबी को क्लीन चिट दे दी और कहा कि उसे गद्दार मानने का कोई कारण नहीं है। यह एमआई-5 की एक और शर्मनाक हार थी। हालांकि फिलबी को एमआई-6 से इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन वह एक पत्रकार के रूप में बेरूत (लेबनान) चला गया और वहां से भी केजीबी के लिए काम करता रहा। अंततः 1963 में, जब एमआई-6 के पास फिलबी के खिलाफ नए सबूत आए और एक अधिकारी को उसका कबूलनामा लेने बेरूत भेजा गया, तो फिलबी भी रात के अंधेरे में एक सोवियत मालवाहक जहाज पर बैठकर मॉस्को भाग गया। वह रूस में ही रहा और 1988 में एक सोवियत नायक (Hero of the Soviet Union) के सम्मान के साथ उसकी मृत्यु हुई।

अन्य दो सदस्यों का अंत भी कम नाटकीय नहीं था। जॉन केर्नक्रॉस से 1951 में पूछताछ की गई थी; उसने कुछ हद तक अपना अपराध स्वीकार कर लिया था और वह चुपचाप रोम चला गया, जहाँ उसने एक शिक्षाविद के रूप में जीवन बिताया। एंथनी ब्लंट ने 1964 में एमआई-5 के सामने पूर्ण अपराध स्वीकार (Confession) कर लिया था, लेकिन शाही परिवार की बदनामी से बचने के लिए उसे ब्रिटिश सरकार द्वारा ‘इम्युनिटी’ (Immunity—सजा से छूट) दे दी गई और उसकी गद्दारी को एक शीर्ष सरकारी रहस्य (Top Secret) बनाकर फाइलों में दबा दिया गया। 15 साल बाद, 1979 में, ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर (Margaret Thatcher) ने हाउस ऑफ कॉमन्स में खड़े होकर दुनिया के सामने यह रहस्योद्घाटन किया कि रानी का कला सलाहकार, सर एंथनी ब्लंट, वास्तव में एक सोवियत जासूस था। इसके बाद ब्लंट से उसकी ‘नाइटहुड’ (Knighthood—सर की उपाधि) छीन ली गई और वह सार्वजनिक अपमान का शिकार हुआ।

इंटेलिजेंस, थिंकटैंक और भू-राजनीति (Geopolitics) का अध्ययन करने वाले छात्रों के लिए ‘द कैम्ब्रिज फाइव’ का यह विस्तृत विश्लेषणात्मक आख्यान तीन सबसे महत्वपूर्ण और स्थायी सबक छोड़ जाता है। पहला: ‘वैचारिक जासूसी’ (Ideological Espionage) दुनिया का सबसे खतरनाक हथियार है। जो जासूस पैसे के लिए बिकता है, वह कभी भी ज्यादा पैसे के लिए दोबारा बिक सकता है, लेकिन जो जासूस किसी ‘विचारधारा’ (जैसे कैम्ब्रिज फाइव का साम्यवाद के प्रति अंधा विश्वास) के लिए काम करता है, वह कभी अपने काम को गद्दारी नहीं मानता; वह इसे एक ‘उच्च उद्देश्य’ (Higher Purpose) मानता है, और इसलिए वह कभी टूटता नहीं है।

दूसरा सबक: ‘संज्ञानात्मक पूर्वाग्रहों’ (Cognitive Biases) की भारी कीमत। ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों ने केवल इसलिए इन गद्दारों पर शक नहीं किया क्योंकि वे अच्छी अंग्रेजी बोलते थे, सूट पहनते थे और प्रतिष्ठित स्कूलों से पढ़े थे। काउंटर-इंटेलिजेंस में किसी भी व्यक्ति का सामाजिक रुतबा, उसकी डिग्रियां या उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि उसे संदेह से परे (Above Suspicion) नहीं बना सकती। ‘ट्रस्ट बट वेरीफाई’ (Trust but Verify—भरोसा करो, लेकिन जांच करो) के सिद्धांत को दरकिनार करने का परिणाम एक पूरे साम्राज्य के खुफिया तंत्र का पतन हो सकता है।

तीसरा और अंतिम सबक: ‘कम्पार्टमेंटलाइज़ेशन’ (Compartmentalization) का अभाव। कैम्ब्रिज फाइव इसलिए इतने सफल हुए क्योंकि एक बार सिस्टम के अंदर घुसने के बाद उनकी पहुँच लगभग हर संवेदनशील फाइल तक थी। आज के आधुनिक खुफिया तंत्रों ने इसी विफलता से सबक सीखते हुए यह नियम बनाया है कि किसी भी अधिकारी को केवल उतनी ही जानकारी दी जाएगी जितनी उसके काम के लिए नितांत आवश्यक है (Need to Know Basis), चाहे वह अधिकारी कितना भी वरिष्ठ क्यों न हो।

‘द कैम्ब्रिज फाइव’ की यह गाथा केवल पांच व्यक्तियों के धोखे की कहानी नहीं है; यह इस बात का एक स्थायी और क्रूर अनुस्मारक है कि राष्ट्रीय सुरक्षा की दीवारों को भेदने के लिए दुश्मन को हमेशा बाहर से मिसाइल दागने की आवश्यकता नहीं होती; अक्सर वे दीवारें उन्हीं लोगों द्वारा भीतर से खोखली कर दी जाती हैं जिन्हें उन दीवारों की रक्षा करने का काम सौंपा गया होता है। इतिहास के इस पाठ ने पश्चिमी खुफिया तंत्र को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया और इस बात को स्थापित कर दिया कि जासूसी के खेल में ‘मित्र’ और ‘शत्रु’ के बीच की रेखा कभी-कभी केवल एक भ्रम मात्र होती है।

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